Saturday, January 2, 2010

"गौ माता "





कितने सुन्दर लग रहे हैं ना ये जूते/सैंडिल!
यह बेहद आरामदायक और सुन्दर हैं....
आप सोच रहे होंगे आखिर मै, क्या कहना चाह रही हूँ?
इससे जुडी कुछ घटनाएं "पत्रकारों द्वारा नेताओं पर जूते से हमले"की घटना याद आ जाती है किन्तु मै ऐसा नहीं, कुछ और कहना चाहती हूँ....
कुछ दिन पहले की ही बात है, हम धमतरी जा रहे थे। रास्ते में एक गाँव पड़ा "सारखी" जहाँ मैंने एक ऐसा दृश्य देखा जिसने मुझे विचलित कर दिया।
एक गाय जो खेत पर मृत पड़ी थी उसे ४-५ कुत्ते नोच- नोंच कर खा रहे थे।
पता नहीं किसकी गाय थी? जिसने इस बेरहमी के साथ उसे ऐसा छोड़ दिया था।
हम हिन्दू गाय को माता कह कर पूजते हैं।
क्या माता की मृत्यु होने पर इस तरह हम खुले जगह पर कुत्ते के खाने के लिए छोड़ दें।
हम मानते हैं कि हमारे शरीर में जीवन (आत्मा) होती है जो प्रयोगों द्वारा भी सिद्ध हुआ है उसी प्रकार पशुओं में भी जीवन (आत्मा) होती है।
जब यह जीवन अपने शरीर का यह हाल देखती होगी या कहें जिनके लिए उसने इतना कुछ किया उनके द्वारा अपना यह हाल देखकर वह दुखी नहीं होती होगी?
यदि हम गौ माता के साथ ऐसा व्यवहार करते हैं तो लानत है हम हिन्दुओं पर।
फिर तो यह कहना होगा कि हिन्दू सबसे बड़े झूठे हैं जो गाय को माता कहते हैं।
इस दृश्य का दूसरा पहलु जो मैने हाल ही में महसूस किया।
हम कल ही जूते खरीदने गए मैंने पहले ही सोच रखा था कि चमड़े के जूते या सैंडिल नहीं लेना है। बहुत से चप्पल और जूते मैंने कोशिश कि पर एक भी आरामदायक नहीं मिले फिर मैंने दुकानदार से कहा भैय्या मेरे पैर में तकलीफ रहती है कृपया आरामदायक जूता दिखाइए। उसने मेरे सामने ३ जोड़े सैंडिल रखे जिसे मैंने पहनकर देखा बहुत ही आरामदायक थे।
"ये चमड़े के जूते थे" मेरी गाय माता के खाल से तैयार किये गए जूते थे।
ह्रदय प्रेम और श्रद्धा से भर गया उस माँ के लिए जो मरकर भी बच्चों को कष्ट में नहीं देख सकती और उनके राहों में कालीन बनकर बिछ जाती है.......

माँ तुम्हें प्रणाम....

6 comments:

Dev said...

रौशनी जी,
आपकी समाज को जागरूक करने का प्रयास अत्यंत सराहनीय है
जरी रखियेगा........

संजय भास्कर said...

रौशनी जी,
आपकी समाज को जागरूक करने का प्रयास अत्यंत सराहनीय है
जरी रखियेगा........

संजय भास्कर said...

BEHTREEN PRASTUTI...

अल्पना वर्मा said...

ह्रदय प्रेम और श्रद्धा से भर गया उस माँ के लिए जो मरकर भी बच्चों को कष्ट में नहीं देखा सकती और उनके राहों में कालीन बनकर बिछ जाती है.......
दृश्य का yah दूसरा pahlu..hi samjhen to behtar hai....aur yahi sach bhi hai.

lekh achcha likha hai.
abhaar.

Nav varsh ki dher sari shubhkamnayen bhi.

संजय भास्कर said...

namaskar roshni ji.....

चंदन कुमार झा said...

बहुत हीं सुन्दर पोस्ट………