Friday, June 7, 2013

"जीने दो और जियो"

सबेरे का अखबार खोला, नवभारत राजधानी (रायपुर) में यह खबर पढ़ते ही हंसी आ गई..
" तहसीलदार, निगम अफसर व पुलिस पर हमला" 
(गनीमत है इनके हाथ सिर्फ लाठियाँ और डंडे थे, बंदूकें नहीं..नहीं तो ये भी नक्सली कहलाये जाते) 
खैर आगे की एक और लाइन, 

...तनाव के बीच अवैध कब्जे हटाये, ६ महिलाएं हुई गिरफ्तार...

अब ये अवैध कब्जाधारी झोपडियों में रहने वाले हैं जिनके घर की महिलाएं घरों में बर्तन मांजकर और झाड़ू पोछा कर और पुरुष रिक्शे चलाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करते हैं...

इनका मूल कारण ढूंढने जाये तो वही...किसी को अपनी आवश्यकता का पता नहीं बस शोषण किये जा रहे हैं जिसे वह अपनी मजबूरी बताता है इसका परिणाम समाज में एक वर्ग बहुत अमीर और दूसरा वर्ग बेहद गरीब, दुःख, असंतोष, विद्रोह इत्यादि...

और एक बात बड़ी विचित्र है...ये वैध और अवैध का चक्कर?

* अगर तुम गोली और डंडे मारो तो वैध, जनता मारे तो अवैध?
* अगर तुम उपजाऊ खेतों का अधिग्रहण करो तो वैध यदि गरीब जनता थोड़ा सा जमीन ले ले तो अवैध?
* अगर तुम शराब की दुकाने खोलो तो वैध बाकी खोले तो अवैध? हालाँकि ये दोनों ही अवैध है.
* तुम अगर खदानें खोदो, पेड़ काटो, खनिज संपदा को विदेशों में भेजो तो सब वैध और जनता करें तो अवैध?
* तुम गायों की हत्या के लिए स्लॉटर हॉउस बनाओ तो वैध? बकायदा इसके लिए लोन भी मिल जाता है वही अगर कोई गौशाला खोलना चाहे तो उसे कोई लोन नहीं?

लिस्ट बनाने जाओ तो शायद कभी खत्म ना होने वाली बनेगी. कहने का तात्पर्य यदि कोई कार्य अवैध है तो वह सभी के लिए अवैध होगा. और यदि वह वैध है तो सभी के लिए होगा...

यह धरती में सारी रचनाएँ व्यवस्था में है, हर एक रचना एक दूसरे से सहयोग करती नज़र आती है...इससे कुछ सीखें और पूरकता अर्थात व्यवस्था में भागीदारी निभाएं, पोषक बनें शोषक नहीं...


"जीने दो और जियो"

1 comment:

आशीष ढ़पोरशंख/ ਆਸ਼ੀਸ਼ ਢ਼ਪੋਰਸ਼ੰਖ said...

जियो और जीने दो!
सुन्दर विचार, रौशनी जी! पर ऐसा होता कहाँ है!?

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थर्टीन ट्रैवल स्टोरीज़!!!