Saturday, January 11, 2014

प्रमाणीकरण एक आवश्यकता

एक लोहे का परमाणु (पदार्थ अवस्था) भी आप कुछ भी कर लीजिए वह लोहा ही रहेगा| (परिणामानुशंगी)

एक आम का बीज, नीम का बीज, करेले का बीज (प्राणावस्था) भी किसी भी अनुकूल स्थिति में जब भी उगेगा तब जिस पौधे या पेड़ का बीज हो वही होगा| (बीजानुशंगी)

एक गाय, शेर या बिल्ली का आचरण भी उसके वंश के अनुसार होगा| एक गाय कभी शेर नहीं बन सकती और एक शेर कभी गाय नहीं बन सकता|

ये सभी प्रमाणित है और सार्वभौम व्यवस्था में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं| ये किसी भी स्थिति में अपने आचरण का त्याग नहीं करते और ना ही इन्हें प्रमाणित होने पर कोई पदक दिया जाना है|

और मानव अवस्था/ ज्ञान अवस्था को देखिये...क्या आचरण होना चाहिए? मानव है तो मानवीयतापूर्ण आचरण से कम में चलेगा क्या? हर स्थिति में यह आचरण होना चाहिए कि नहीं? (संस्कारानुशंगी)
पर यहाँ तो यह हाल है कि एक फूलझड़ी (किसी आवेशित परमाणु/ मानव द्वारा) लगी नहीं कि सीधे रॉकेट बन आसमान में ब्लास्ट हो जाते हैं|
क्या हम एक लोहे के टुकड़े, एक चूहे, बिल्ली से भी गए गुजरे हैं कि अपने आचरण में रह नहीं सकते?
"प्रमाणित होना " कोई गोल्ड मेडल की प्राप्ति के लिए नहीं| यह एक आवश्यकता है| हर मानव की आवश्यकता है जैसे लोहे का कण कहीं भी हो लोहा ही रहेगा वैसे मानव कहीं भी हो उसे मानव के आचरण में ही होना चाहिए|
तभी हम सार्वभौम व्यवस्था में अपनी भागीदारी निभा पायेंगें/ भूमिका का निर्वहन कर पायेंगें|
वरना इस सृष्टि को हमारी कोई आवश्यकता भी नहीं है|
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जांचिए प्रमाणित होने की आवश्यकता है कि नहीं?

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