Sunday, December 22, 2024

Why Ego?

When we pay attention, we find that we keep getting/receiving nourishment, protection or use of all the four orders directly or indirectly every moment, such as:-


We keep breathing throughout the day, keep drinking water from time to time, walk on the earth (means nourishment, protection from the material order)

We eat food two or three times a day, take medicines during illness (means nourishment, protection from the Pranic Order and the Animal Order)

We keep wearing clothes throughout the day like cotton clothes (means nourishment, protection from the Pranic Order), sweaters and shawls (means nourishment, protection from the Animal Order ), raincoats during the rain (means nourishment from the material order)

We live in a house with our family, study in a school, work in an office under one roof (means protection of the material order)

We use mobile phones, laptops for our work and plough, tractor, bulls, ropes etc. for agricultural work (use of the material order, the Pranic Order  and the  Animal Order  and cooperation of humans as a collaborator)

In the family, in the society, we have relations with humans all the time, whether they are of certain expectations or Of contact (cooperation of human order, exchange of values)

We (whole body and I) are always immersed, soaked and surrounded (saturated) in the Space, (means continuous receiving nourishment, protection, energy from the Space/ almighty)

One thing is left out, this body which we have received as a gift is also a gift to us from Material order, Pranic order and animal order. (Human body has originated from the body of some animal's womb)

And I (jeevan) myself? My existence as a result of transition from the material order!!! (development)

Despite all this, instead of gratitude, why do we have arrogance about?




(Presented as a student of MadhyasthaDarshan. If any error I'm responsible for this.)

Saturday, December 21, 2024

ज्ञान (सह अस्तित्व में अनुभव) की आवश्यकता क्यों?

 ज्ञान (सह अस्तित्व में अनुभव) या ज्ञान की सूचना या चेतना विकास मूल्य शिक्षा की आवश्यकता क्यों?

जैसा कि हम पहले प्रकृति से कैसे जुड़े हैं, कैसे हर क्षण हम चाहे या न चाहे धरती की चारों अवस्था के साथ जुड़े ही हुए हैं और हर क्षण कुछ न कुछ लेते ही रहते हैं। हम स्वयं प्रकृति का अंश हैं इन मुद्दों पर थोड़ा संवाद किये थे। अब आगे संवाद करते हैं कि हमें ज्ञान की आवश्यकता क्यों?

तो आइए स्वयं को देखते हैं। मैं को देखते हैं। मैं भी एक प्रकृति का ही अंश हूँ। (जीवन और मानव शरीर का संयुक्त साकार रूप)

जैसे ही मुझे अर्थात मैं (जीवन/ चैतन्य इकाई) को एक विकसित मेधस युक्त शरीर का संचालन करने का अवसर प्राप्त होता है मैं एक मानव कहलाता हूँ।

मैं दिन भर क्या करता हूँ? तो मेरा ध्यान जाता है कि जब से मैं पैदा हुआ हूँ याने मानव तन के साथ हूँ तब से आज (बाल्य अवस्था से प्रौढ़ा अवस्था तक) तक कुछ न कुछ कर ही रहा हूँ।

उदाहरण के लिए मैं एक कार्य (खेती) को ध्यान देता हूँ तो दिखता है प्रकृति की एक अवस्था जैसे बीजों (प्राण अवस्था) को लेकर शरीर (प्राण अवस्था) की सहायता से एक खेत/बाड़ी/जमीन (पदार्थ अवस्था, प्राण अवस्था) में लगाता हूँ। तथा शरीर(प्राण अवस्था) द्वारा लगने वाले मेहनत को श्रम कहता हूँ।

अब इस बीज (प्राण अवस्था) से स्वयं ही एक नन्हा पौधा (प्राण अवस्था) निकलता है। इसमें मेरी कोई मेहनत नहीं।

इस फसल का पानी व गोबर खाद/ जैविक खाद (पदार्थ अवस्था) के उपयोग से देखभाल करता हूँ।

समय बीतने के साथ फसल (प्राणावस्था) एक दिन पक जाती है। मैं उसे किसी औजार (पदार्थ अवस्था) की सहायता से काट लेता हूँ।

फसल से प्राप्त उत्पाद को प्रोसेस करके दूसरे रूप में रूपांतरित कर देने में सहयोग करता हूँ जैसे मुरब्बा, आचार, आटा, जूस, कपड़े (प्राण अवस्था, पदार्थ अवस्था) इत्यादि तथा उसका विनिमय करता हूँ।

पर मैंने किया क्या? मैंने तो एक वस्तु को भी उत्पन्न नहीं किया! मैंने केवल एक नियम को समझकर प्रकृति से एक चीज ली और दूसरे चीज में रूपांतरित करने में सहयोग किया।

यदि सेवन भी करता हूँ तो एक अवस्था शरीर (प्राण अवस्था) का पोषण भोजन (प्राण अवस्था ) के द्वारा ही हो रहा है। या मैं पोषण में सहयोग कर रहा हूँ ताकि इस तन (प्राण अवस्था) का सदुपयोग कर सकूँ। वस्तु तो वहीं को वहीं उपयोग हो रहा है।

तो मेरी स्वयं की तो कोई चीज ही नहीं!

तो मेरा क्या है?

"ज्ञान"..... या सूचना/ चेतना विकास मूल्य शिक्षा के रूप में मिली एक मान्यता जिसे शोधपूर्वक हर पल जाँचते रहते हैं। जब स्वीकृति बन जाती है तब वह मेरी हो जाती है।

ज्ञान ही है जो मेरी है मेरे साथ हमेशा रहेगा।

सत्य के ज्ञान से ही मुझे मेरी संरचना (आत्मा, बुद्धि, चित्त, वृत्ति और मन) का ज्ञान होता है या सूचना मिलती है।

ज्ञान की सहायता से मुझे धरती कि चारों अवस्था का ज्ञान या सूचना मिलती है उसके रूप, गुण, स्वभाव और धर्म की सूचना मिलती है।

इसी ज्ञान की सहायता से मुझे कई प्रकार के बीजों (प्राण अवस्था) का ज्ञान होता है।

ज्ञान की ही सहायता से मैं कई प्रकार के मौसम में कई प्रकार के फसलों को ले पाता हूँ।

ज्ञान की सहायता से श्रमपूर्वक उत्पादन फलस्वरूप समृद्धि के भाव को प्राप्त कर पाता हूँ।

ज्ञान ही है जिसकी सहायता से मैं संबंधों में न्याय प्रमाणित करने का प्रयास करता रहता हूँ या कर पाता हूँ या मूल्यों को प्रमाणित कर पाता हूँ।

स्वयं की पहचान, अस्तित्व (जड़, चैतन्य और व्यापक) व मानवीयता पूर्ण आचरण को जानना मानना ही ज्ञान है।

ज्ञान होने पर ही मैं न्याय पूर्वक विनिमय कर पाता हूँ।

ज्ञान होने पर ही मैं औषधियों (प्राण अवस्था) का उपयोग कर अपने व संबंधियों या अन्य अवस्थाओं (प्राण व जीव) के स्वास्थ्य का ध्यान रख पाता हूँ।

शिक्षा में पूर्णता ही तब आएगी जब विद्यार्थियों को चेतना विकास मूल्य शिक्षा के साथ कौशल या तकनीकी ज्ञान/ शिक्षा भी मिले।

ज्ञान ही है जिसकी सहायता से हर मानव अपनी चेतना के विकास के लक्ष्य अर्थात अपनी पूर्णता (क्रिया पूर्णता व आचरण पूर्णता) को प्राप्त कर सकता है तथा दूसरों को इस लक्ष्य प्राप्ति में शिक्षा द्वारा सहायता कर सकता है।

ज्ञान या सूचना होने पर ही मैं प्राकृतिक नियमों, सामाजिक नियमों व बौद्धिक नियमों को पहचानकर अपनी जिंदगी शान से जी पाता हूँ।

ज्ञान के द्वारा ही व्यक्ति में पूर्णता, समाज में पूर्णता, राष्ट्र और अंतर्राष्ट्र की पूर्णता क्या है इसकी सूचना मिलती है जिससे हम इस लक्ष्य हेतु सहयोग कर पाते हैं।

ज्ञान ही है जिसकी सहायता से हमें प्रकृति की सभी अवस्थाओं का प्रयोजन समझ आता है व हम उसका सदुपयोग कर पाते हैं इत्यादि।

अर्थात

ज्ञान द्वारा ही हम तन (जिसमें पदार्थ, प्राण और जीव अवस्था समाया हुआ ही है), मन (जीवन) और धन (पदार्थ, प्राण और जीव अवस्था) का पूरी तरह सदुपयोग कर सुख, शांति, संतोष और आनंद की प्राप्ति कर पाते हैं।

अन्ततः हमने देखा कि हमारे लिये सबसे महत्वपूर्ण सह अस्तित्व ज्ञान ही है। प्रकृति की सभी वस्तुएँ शरीर सहित मात्र उपयोग सदुपयोग की जा सकती है। आप चाहकर भी उसे निरंतर कई शरीर यात्रा में अपने साथ नहीं रख सकते। वह अस्तित्व के नियमों के अनुसार उसका रूप परिवर्तन होता ही रहता है पर ज्ञान (सह अस्तित्व में अनुभव) ही है जो मेरा है। हर पल मेरे साथ है।

दूसरे अर्थों में ज्ञान ही है जिसके सहायता से मैं स्वयं अपनी बल और शक्तियॉ को पहचान कर उसकी सहायता से धरती की अन्य अवस्थाओं को सदुपयोग कर पाता हूँ।

सह अस्तित्व रूपी परम सत्य के ज्ञान के अभाव में मेरे पास सभी अवस्थाओं के होने के बावजूद भी इनका सदुपयोग नहीं कर पाऊंगा सम्बन्धों में न्याय नहीं कर पाऊँगा। फलतः परिणाम मन और धरती में प्रदूषण और असंतुलन दिखाई पड़ता है।

अतः इस धरती के सभी मानवों को सह अस्तित्व रूपी सत्य के ज्ञान का पूरा अधिकार है। ज्ञान से किसी मानव को वंचित रखना अमानवीयता कहलाएगी।

सह अस्तित्व रूपी परम सत्य ज्ञान से ही चित्त में उठी जिज्ञासा शान्त होती है व हम तृप्त होते हैं अहंकार का शमन होता है इस कारण दया, कृपा, करुणा, धीरता, वीरता, उपकार अर्थात मानवीय स्वभाव में जी पाते हैं...

(मध्यस्थ दर्शन के विद्यार्थी के हैसियत से प्रस्तुति, किसी भी प्रकार की त्रुटि होने पर मैं लेखिका रोशनी स्वयं जिम्मेदार हूँ)




Sunday, December 8, 2024

किस बात का अहंकार?

 जब हम ध्यान देते हैं तब पाते हैं हमें हर पल चारों अवस्थाओं का प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से पोषण, संरक्षण मिलता/मिला ही रहता है या प्रयोग उपयोग करते ही रहते हैं जैसे :-

हम दिन भर सांस लेते रहते हैं, समय समय पर पानी पीते रहते हैं, धरती पर चलते हैं (पदार्थ अवस्था से पोषण, संरक्षण) 

हम दिन में 2 या तीन बार भोजन करते हैं, बीमारी के समय औषधियों का सेवन- (प्राण अवस्था, जीव अवस्था से पोषण, संरक्षण)

हम दिन भर वस्त्र पहने रहते हैं जैसे सूती के वस्त्र (प्राण अवस्था से संरक्षण), स्वेटर शाल ( जीव अवस्था से संरक्षण),  बारिश के समय रेनकोट (पदार्थ अवस्था से संरक्षण)

हम परिवार सहित एक घर में रहते हैं , किसी विद्यालय में शिक्षा ग्रहण करते हैं किसी कार्यालय ने एक छत के नीचे काम करते हैं (पदार्थ अवस्था का संरक्षण)

हमारे काम काज के लिए मोबाइल, लैपटॉप तथा कृषि जैसे कार्यों के लिए हल, ट्रैक्टर, बैल, रस्सी इत्यादि का प्रयोग ( पदार्थ अवस्था, प्राण अवस्था और जीव अवस्था का उपयोग तथा मानव का सहयोगी रूप में सहयोग)

परिवार में, समाज में हर वक्त मानव से संबंध चाहे निश्चित अपेक्षाओं के हो या संपर्क के (मानव अवस्था का सहयोग, मूल्यों का आदान प्रदान )

व्यापक में तो हम ( पूरा शरीर और जीवन ) हर वक्त डूबे भीगे और घिरे (संपृक्त) रहते हैं,  (व्यापक से पोषण, संरक्षण, ऊर्जा प्राप्त)

एक बात तो रह ही गई ये जो शरीर गिफ्ट मिला है वह भी तो पदार्थ, प्राण, प्राण और जीव अवस्था की ओर से हमें उपहार है। (मानव शरीर की उत्पत्ति किसी न किसी जीव के शरीर से ही हुई है)

और मैं (जीवन) स्वयं? पदार्थ अवस्था में संक्रमण फलस्वरूप मेरा अस्तित्व !!! (विकास)

इन सबके बावजूद भी हममें कृतज्ञता के स्थान पर किस बात का अहंकार रहता है?



(मध्यस्थ दर्शन के विद्यार्थी के हैसियत से प्रस्तुति)

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इस पोस्ट पर एक सुंदर टिप्पणी उपासना मिश्रा दीदी जी से आया है। 

"कृतज्ञता और परस्पर पूरकता का भाव जो स्वयं में व्यवस्था (स्वत्व) के साथ, संबंध और व्यवस्था में व्यवस्थित भागीदारी (स्वतंत्रता) और स्वयं के वैभव (स्वराज्य) के रूप मैं दिखता है। सुंदर व्याख्या दीदी..."

Friday, November 22, 2024

सह अस्तित्व का प्रकाशन

कभी हम किसी फूल, पौधे, वृक्ष, पंछी, बच्चे, किसी स्त्री/पुरुष या स्वयं की सुंदरता देखकर मुग्ध हो जाते हैं। 




कभी छोटे बच्चों की निश्चल मुस्कुराहट हमारा ध्यान खींच लेती है।  


कभी किसी के सुंदर भावपूर्ण व्यवहार या एक भावपूर्ण परिवार को देखकर हम भी खुशी से भर जाते हैं।



मुख्यत: हम देख क्या रहे हैं? 

पर जब हम ध्यान से देखते हैं तब...

हमें दिखाई देता है जड़ प्रकृति, चैतन्य प्रकृति और व्यापक (निरपेक्ष ऊर्जा/ परम सत्ता/ शून्य) का "सह अस्तित्व"....


हमें दिखाई देता है...

सह अस्तित्व के रूप में व्यापक, व्यापक में प्रकृति, 

प्रकृति (जड़ व चैतन्य) में व्यवस्था, हार्मोनी, सुंदर तालमेल 


तथा हमें दिखाई देता है....

पदार्थ अवस्था, 

प्राण अवस्था, 

जीव अवस्था 

ज्ञान अवस्था द्वारा व्यापक का भावों/ मूल्यों के रूप में प्रकाशन.... 🌸

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चारों अवस्था में मानव को छोड़कर सभी अपने डिजाइन के अनुरूप प्रकाशित हैं।

मानव में अपने डिजाइन के अनुरूप प्रकाशन "मानव चेतना" कहलाता है अन्यथा अपने डिजाइन के विपरीत जीना जागृतिक्रम या जीव चेतना कहलाता है।

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परिभाषाएँ-

  • व्यापक - सर्वत्र विद्यमान सत्ता, ऊर्जा, शून्य, व्यापक, ईश्वर, ब्रह्म, चेतना, ज्ञान, लोकेश, परमात्मा, निरपेक्ष शक्ति।

  -सर्वत्र, सर्वकाल में साम्य रूप में वर्तमान।

  • जीव अवस्था - जड़- चैतन्य का संयुक्त साकार रूप
  • ज्ञान अवस्था- जड़- चैतन्य का संयुक्त साकार रूप
  • मूल्य - जीवन मूल्य, मानव मूल्य, स्थापित मूल्य, शिष्ट मूल्य, उपयोगिता मूल्य व कला मूल्य का प्रमाण परंपरा।       

- प्रत्येक इकाई में निहित मौलिकता ही मूल्य है।

(प्रस्तुति मध्यस्थ दर्शन के विद्यार्थी के हैसियत से)

(चित्र: साभार गूगल)


Tuesday, November 19, 2024

व्यवस्था / संतुलन

 असंतुलन या अव्यवस्था ही प्रकृति में व मानव शरीर और मन में प्रदूषण है। 

यदि प्रकृति में चारों अवस्था में असंतुलन है तो होने वाला परिणाम प्रदूषण है, अव्यवस्था है।

यदि मानव तन में द्रव्य पदार्थों का असन्तुलन है तो उसका परिणाम अस्वस्थ शरीर है।

यदि मानव मन, विचारों में असंतुलन है तो परिणाम मानसिक अस्वस्थता, शारीरिक अस्वस्थता व प्रकृति में असंतुलन है अर्थात अव्यवस्था है।

समाधान- 

यदि प्रकृति के चारों अवस्था में, मानव के शरीर में और मानव मन में संतुलन या व्यवस्था देखनी है तो 

"स्वयं में व्यवस्था का ज्ञान", "प्रकृति या अस्तित्व में व्यवस्था का ज्ञान" तथा "मानवीयता पूर्ण आचरण का ज्ञान" आवश्यक है।

बगैर इन तीनों ज्ञान के कहीं भी संतुलन/ व्यवस्था संभव नहीं साथ ही

निरंतर व्यवस्था में/से/के लिए भागीदारी संभव नहीं।

(विचार मध्यस्थ दर्शन के विद्यार्थी के हैसियत से)

Thursday, May 4, 2023

प्रचार तंत्र की भूमिका

जीव चेतना से मानव चेतना में संक्रमण हेतु सूचनाओं के प्रसारण में प्रचार तंत्र बहुत बड़ी भूमिका निभा सकता है।

आज हम किसी भी व्यक्ति को अपराध या गलती के नाम पर पीड़ा देते हैं, जेल में बंद कर देते हैं, तरह तरह की सजा देते हैं जबकि अपराध एक मानसिकता है। और मानसिकता में परिवर्तन ही सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन है। (शरीर को कष्ट देने से मानसिकता में परिवर्तन नहीं हो सकता।)

ऐसे परिवर्तन के लिए प्रचार तंत्र के समक्ष यह प्रस्ताव है कि निरंतर जो भी कार्यक्रम आये जैसे किसी विषय पर डिबेट (जब सार्थकता के अर्थ में बातचीत होगी उसे "संवाद"कहा जायेगा) या कोई समस्या हो उस पर संवाद वह "जीवन ज्ञान, अस्तित्व दर्शन ज्ञान, मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान (मध्यस्थ दर्शन)" के प्रकाश में ही आये (समस्या, उसका कारण और उसका निदान पर संवाद)।

जब यह बहुत बड़े स्तर पर प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया जाएगा तो बहुत ही बड़ी संख्या में मानव स्वतः ही मानव चेतना के प्रति जिज्ञासु होंगे। बहुत से अपराध स्वतः ही बंद हो सकते हैं।

देश भर में प्रयोग तो हो ही रहे हैं वे सभी प्रभावशाली ढंग से रखे जाए व यदि किसी व्यक्ति की मानसिकता में परिवर्तन हुआ और वह उसे लोगों के सामने साझा करना चाहता है तो ऐसे लोगों को भी उनकी शेयरिंग के लिए आमंत्रित किया जाए उनका अभिनदंन किया जाए तो समाज में हो रहे बदलाव को और भी गति मिल सकती है। ऐसा मेरा मानना है।

और सबसे सुंदर बात होगी कि हम एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप नहीं करेंगे।

ज्ञान के प्रकाश में या ज्ञान पर चल रहे उदाहरणों से स्वयं में देखेंगे कि हममें क्या कमी है और उसे कैसे पूरा करें।

अभी तो हमें अपराध के नाम पर वही नजर आता है जो मीडिया में दिखाया जाता है उससे भी ज्यादा खतरनाक स्थिति है हमारे सामने।

और अभी तो हमको यही समझ नहीं आता कि सही क्या गलत क्या?

हो सकता है इस प्रयोग से अपराध में स्व नियंत्रण आ जाये? आपके क्या विचार हैं?

जैसे उदाहरण के लिए मैंने एक पोस्ट पर यह एक लाइन का कॉमेंट किया इतने लोगों की स्वीकृति देखकर मुझे बहुत हैरानी हुई!


तो "शिक्षा" पर लोगों में अच्छी स्वीकृति बन चुकी है या इस पर सोचने तो लगे हैं! यह प्रचार तंत्र का ही कमाल है और सफलता है! इसे प्रचार तंत्र का सदुपयोग ही कहा जायेगा। 

आज भले ही समीक्षा हो रही है पर लोग शिक्षा पर तो बात कर रहे हैं यह भी एक बड़ी उपलब्धि है।

Tuesday, April 11, 2023

आरिफ़ और उसका दोस्त सारस

एक महीने बाद आज आरिफ़ भाई जी और उसके दोस्त सारस का कानपुर चिड़ियाघर में आपस में मिलना हुआ। दोनों ही भावुक और खुश थे। सारस को एक बंद बाड़े में रखा गया है उसे दूर से ही देखने की परमिशन है।



सारस जो की आरिफ़ भाई जी को उनके खेत में घायल अवस्था में मिला था तो उन्होने वही किया जो एक मानव का फर्ज था। उसने उसकी मरहम पट्टी की, खूब सेवा की, खूब प्यार किया, एक बच्चे की तरह रखा। साथ में खाना, घूमना यह सब चलता रहा। सारस जब उसे मन करता उड़कर जंगल अपने परिवार से मिलकर आता पर बाकी समय उसे आरिफ़ के साथ ही रहना पसंद था।  





उनके प्रेम को देखकर एक राजनीतिज्ञ जी मिलने आते हैं वैसे ही सत्ता में बैठे पक्ष की आँखें पूरी तरह चौकन्नी हो जाती है।
बस यहीं से शुरू होती है एक और कहानी –दुखों की कहानी, अमानवीयता की कहानी, कानून के आड़ में घिनौनी राजनीतिक चाल की कहानी।
दोनों को एक दूसरे से जुदा कर दिया जाता है पहले सारस को एक पक्षी विहार में रखा जाता है जहाँ से वह उड़ कर किसी गाँव में पहुँच जाता है वहाँ से फिर वन विभाग उसे पकड़ कर कानपुर चिड़ियाघर में क्वारंटाइन कर देती है। एक आजाद पंछी को कैद कर लिया जाता है।
अब यहाँ से मेरे मन में राजनीतिज्ञों के अहंकार और ईर्ष्या पर प्रश्न के साथ चिड़ियाघर की औचित्यता पर भी प्रश्न उठता है कि इसका प्रयोजन क्या?
क्या हम इंसानों के मनोरंजन के लिए इन वन्य प्राणियों को पिंजरे में रखा जाना प्रयोजन है?
अगर ऐसा है तो यह इंसानियत के विपरीत है।
या बीमार पशु पक्षी की देखभाल के लिए चिड़ियाघर है?
अगर बीमार पशु की देखभाल के लिए है तो उसे इलाज के पश्चात परिस्थिति अनुसार वापस उसके रहवास में छोड़ देना चाहिए!
या सेंचुरी में रखना चाहिए!
सुरक्षा के नाम पर किसी को पिजड़े में कैद करना और सोचना कि वह खुशहाल है यह आपके समझदारी पर प्रश्न चिन्ह है।
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दूसरा प्रश्न है हम बच्चों के सामने क्या उदाहरण रखना चाहते हैं?
• पहला दृश्य यह कि एक आदमी ने बहुत प्यार से एक जीव/ पंछी का पोषण कर रहा है, आजाद रखा है और दोनों खुश हैं।
• दूसरा दृश्य जीव जानवर स्वच्छंद अपने प्राकृतिक आवास में घूम फिर रहे हैं।
• तीसरा दृश्य बहुत से जीव जानवरों को छोटे छोटे पिंजरे में रखा गया है। जहाँ न वे अच्छे से घूम पाते हैं न उड़ पाते हैं?
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कौन से दृश्य से बच्चों के मन में सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा?
• पहला दृश्य से बच्चों के सामने एक मानव कैसे चारों अवस्था के साथ सुंदर से तालमेल के साथ रह पा रहा है या रह सकता है यह सीखने को मिलता है।
(आज जब एक घायल पंछी को इलाज कर नया जीवन दान के बदले यह प्रताड़ना मिल रही है तो कौन आगे घायल जीव जन्तु की रक्षा के लिए आगे आएगा?)
• दूसरा दृश्य - बच्चों के मन में जीव जंतुओं के प्राकृतिक आवास मे उनके रहन सहन के प्राकृतिक तरीकों को देख कर उसे प्राकृतिक आवास की व्यवस्था को कैसे बनाए रखें जिसमें वे सुरक्षित रहें इस पर ध्यान जाता है।
• तीसरा दृश्य- इससे बच्चों के मन मे यह जाएगा कि प्रकृति की हर एक अवस्था को पिंजरे मे मनोरंजन के लिए रखा जा सकता है। बस दाना पानी का इंतजाम कर लो। आजादी की खुशी क्या होती है बच्चे तो यह कभी समझ ही नहीं पाएंगे।
बच्चों के लिए शिक्षा का उदाहरण इन्हीं समाजों से आएगा न कि पिंजरों से? इसलिए आप सभी बड़े राजनेताओं से विनम्र विनती है कि ऐसे सुंदर शिक्षा प्रद वातावरण को थोड़ी बहुत और सुधार कर और भी बढ़ावा दिया जाए। इन्हें कुचला न जाए।
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अगला प्रश्न यदि कोई जीव जन्तु की प्रजाति खत्म होने की अवस्था मे आ गई है तो इसके जिम्मेदार कौन?
क्या उन्हें पिंजरे में बंद कर रखने से वे सुरक्षित हैं? क्या यह समाधान है?
क्यों उनके प्राकृतिक आवास उजाड़े जा रहे हैं? क्यों जंगलों को अपने लालच के लिए काटे जा रहे हैं? क्यों?
पहले आप/हम अपनी मानसिकता पर काम करें। प्रकृति की व्यवस्था को समझें, प्रकृति के नियम समझें उसके अनुसार कार्य करें।
आरिफ़ ने कुछ भी गुनाह नहीं किया। उसने प्रकृति के नियमों के अनुसार ही उस सारस की मदद की। उसे आजाद रखा। आरिफ़ एक मानव हैं इसलिए उसने मानवीयता दिखाई यही प्रकृति का नियम है। जिसके लिए उन्हें बहुत बड़ा पुरस्कार मिलना ही चाहिए।
और उसके लिए वह बड़ा पुरस्कार होगा....
“उसका दोस्त सारस!”

Sunday, April 9, 2023

जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करना

➡️पहचानने और निर्वाह करने की ताकत....
➡️गठन शील परमाणु का लक्ष्य, ताकत व परिणाम...
➡️गठन पूर्ण परमाणु का लक्ष्य, ताकत का अंतिम परिणाम इस धरती में शेष....
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🌺पहचानने और निर्वाह करने की ताकत देखिये...

● पदार्थ अवस्था के अंतर्गत परमाणुओं (गठनशील परमाणु) में निहित अंशों के एक दूसरे को लगातार निरंतर पहचानने, निर्वाह करने व पूरकता की ताकत ये धरती व ग्रह गोल.....

● पदार्थ अवस्था के अंतर्गत परमाणुओं (गठनशील परमाणु) में निहित अंशों के एक दूसरे को लगातार निरंतर पहचानने, निर्वाह करने व पूरकता की ताकत ये धरती और रस रसायन...

● पदार्थ अवस्था के अंतर्गत परमाणुओं (गठनशील परमाणु) में निहित अंशों के एक दूसरे को लगातार निरंतर पहचानने, निर्वाह करने व पूरकता की ताकत ये धरती, रस-रसायन और सांस लेती कोशिकाएं (काई से लेकर पेड़ पौधे व जीव और मानव शरीर)।

कैसे सुंदर व्यवस्था को पहचान कर निर्वाह कर रहे हैं। एक एक कोशिकाओं में छोटी सी छोटी इकाई व्यवस्थित, हर जगह व्यवस्था।

● यह गठन शील परमाणु के स्वयं में व्यवस्था की ताकत का परिणाम है।
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🌺 जीवन परमाणु की ताकत जीव अवस्था में निरंतर मानने, पहचानने और निर्वाह करने की क्रिया के रूप में दिखाई देती है।
इससे सिद्ध होता है कि इकाइयाँ जिस वस्तु को पहचानती है उसके साथ निर्वाह करती ही है।

● अभी मानव स्वयं को शरीर मानकर उसके अनुरूप ही पहचानना और निर्वाह करता है। सारा कार्य व्यवहार शरीर और शरीर से जुड़ी पहचान को समर्पित।

● जब स्वयं को जानना हो जाये तो मानना, पहचानना और निर्वाह करना स्वयं के लक्ष्य को समर्पित होगी।
स्वयं का लक्ष्य (सुख, शांति, संतोष आंनद)…
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🌺 अब जीवन परमाणु की “स्वयं में व्यवस्था” ही “सार्वभौम व्यवस्था” का आधार बनेगी। यही काम इस धरती पर शेष रह गया है।

● स्वयं में व्यवस्था अर्थात "जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करना"...

● जानना, मानना, पहचानना और निर्वाह करने की ताकत अर्थात गठनपूर्ण परमाणु का प्रयोजन अभी पूरा नहीं हुआ है।
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● जीवों में जीवन शरीर से संचालित है।

जबकि मानव में शरीर जीवन से संचालित होने की आवश्यकता है।

🌺 जीवन (गठनपूर्ण परमाणु) में मन, वृत्ति, चित्त और बुद्धि आत्मा से संचालित होने की आवश्यकता है। दूसरे शब्दों में “शरीर मन को समर्पित, मन वृत्ति को समर्पित, वृत्ति चित्त को समर्पित, चित्त बुद्धि को समर्पित व बुद्धि आत्मा को समर्पित” या मन, वृत्ति, चित्त, बुद्धि का आत्मानुगामी होना, या आत्म प्रतिष्ठा (आत्मा संकेतानुसार बुद्धि, चित्त, वृत्ति एवं मन के क्रियाकलाप।)

● और यह काम होगा समझदारी से...

● समझदारी आती है -
स्वयं की व्यवस्था का ज्ञान से ( जीवन ज्ञान),
अस्तित्व की व्यवस्था के ज्ञान से (अस्तित्व ज्ञान) व
मानव की इस सार्वभौम व्यवस्था में 3 नियमों {प्राकृतिक, सामाजिक व बौद्धिक} सहित स्वयं के प्रयोजन के ज्ञान से (मानवीयता पूर्ण आचरण ज्ञान)...
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🌺 हमको सिस्टम ( सार्वभौम व्यवस्था) के हिसाब से फिट होना है न कि सिस्टम (सार्वभौम व्यवस्था) को हमारे हिसाब से।

● अस्तित्व में सिस्टम (सार्वभौम व्यवस्था) है पाँच आयाम और उसमें भागीदारी...

● जैसे अभी हम एक ही व्यक्ति कई जगह जैसे घर में , खेत मे, बाजार में, मॉल में, ऑफिस में, सोशल मीडिया में, समाज में, इंटरनेट की दुनिया में जैसा कार्य व्यवहार करना होता है वैसा ही करते हैं।

पर अभी तृप्ति नहीं मिली क्योंकि यह सह अस्तित्व के डिजाइन के विपरीत है।
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● व्यवस्था ही पहचान आती है। इकाइयों की पहचान व्यवस्था में भागीदारी ही है।

● जैसे शरीर एक व्यवस्था है उसमें व्यवस्था दिखती है और सारे अंग अव्यवयों की उस व्यवस्था को बनाये रखने में भागीदारी दिखती है।

● अत: ऐसे ही सह अस्तित्व के नियमों, प्रयोजनों/ सार्थकता को जानना, मानना, पहचानना... उसके अनुरूप सार्वभौम व्यवस्था (सिस्टम) को पहचानने तदनुरूप उसमें भागीदारी करना आज की आवश्यकता है।
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🌺 सार्वभौम व्यवस्था 5 आयाम (1.शिक्षा-संस्कार, 2.न्याय-सुरक्षा, 3.स्वास्थ्य-संयम, 4.उत्पादन-कार्य, 5.विनिमय-कोष) में भागीदारी...

और यह व्यवस्था समझदारी (3 ज्ञान) से सुत्रित होगी। फलस्वरूप सह-अस्तित्व में “अखंड समाज/ दस सोपानीय व्यवस्था” के रूप में प्रकाशित होगी।

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(मध्यस्थ दर्शन की रोशनी में व्यक्त विचार, प्रस्तुति: रोशनी (विद्यार्थी की हैसियत से))