Wednesday, July 2, 2014

हम विश्वास पूर्वक जीना चाहते हैं कि अविश्वास में?

हम विश्वास पूर्वक जीना चाहते हैं कि अविश्वास में?
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"ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या"
कि 
"ब्रह्म सत्य, जगत शाश्वत"
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क्या सहज स्वीकार होता है?

निश्चित रूप से आपका उत्तर स्वयं में आएगा कि "ब्रह्म सत्य, जगत शाश्वत" पर दूसरे ही क्षण आपमें दूसरा विचार उठेगा और उन लोगों को ज्यादा परेशान करेगा जो इसमें ज्यादा (वेद पुराण में) पारंगत हैं कि हमारे संत ऋषि- मुनि गलत कैसे हो सकते हैं जिन्होंने इसे देखा, जिनकी चाहना सर्व शुभ की है मानव जाति के कल्याण की है वे गलत कैसे हो सकते हैं| इस प्रकार आपके ऊपर उनका "मानना" हावी हो गया और आपने अपने अंदर की "सहज स्वीकृति" का गला घोंट दिया| 
अब इसका प्रभाव देखिये अब तक क्या हुआ?
शुरुआत ही अविश्वास से हुआ कि मात्र "ब्रह्म ही सत्य है और जगत मिथ्या" अर्थात आप, हम, हमारे बच्चे, हमारा परिवार, समाज, हमारे द्वारा बनाई गई सारी प्रणाली, सारी प्रकृति ही मिथ्या है| इस प्रकार हम गृहस्थ में रहकर भी इस बात से पूरी तरह अनजान रहे कि परिवार ही इन सारी व्यवस्था ( अखंड समाज और सार्वभौम व्यवस्था) का आधार है| 
"ब्रह्म ही सत्य है और जगत मिथ्या" का प्रभाव यह हुआ कि हम हमारे अपनों पर ही विश्वास नहीं कर पाये| औरों की बात ही छोड़िये हम स्वयं पर ही विश्वास नहीं कर पाये| 

"ब्रह्म से ही जीव-जगत पैदा हुआ और इसी में विलीन हो जाना बताया" इस एक और मान्यता का मतलब हम कुछ करें या ना करें आखिर ब्रह्म में ही तो समाना है सब कुछ माया है तो इससे अच्छा है कुछ करें ही नहीं बस ब्रह्म की याद में डूबे रहें और लोगों को इसके बारे में बताते रहे और लोग हमें दान दक्षिणा देते रहे| हम तो महान है क्योंकि हम उस ब्रह्म की याद में डूबे हुए हैं जो एकमात्र सत्य है और बाकी मिथ्या लोग, माया में डूबे लोग अगर हमें दान देंगें तो वे मोक्ष को प्राप्त हो जायेंगे| (यह उन लोगों की बात है जिन्हें प्रकृति के साथ श्रमपूर्वक उत्पादन/समृद्धि का ज्ञान नहीं )

एक बात और देखी..जैसे ही हमारे घर में किसी संबंधी की मृत्यु होती है आपको/ हमको ऐसा लगता है कि अब कुछ बचा ही नहीं..हम स्वयं को ठगा सा महसूस करते हैं कि हमने जिनके साथ तमाम जिंदगी का सफर तय किया वह इस दुनिया में ही नहीं है उसका अस्तित्व ही नहीं है चूँकि हमने तो मान रखा है ना कि "ब्रह्म ही सत्य है और जगत मिथ्या" तो हमारा निराशा में जाना तो एकदम निश्चित है| 
अब इस घोर निराशा में डूबकर, जगत को मिथ्या मानकर, इस अविश्वास में रहकर हमने क्या उपलब्धि की यह हम सबके सामने है ही|
स्वयं का और परिवार में जीना सही नहीं रहा इसका असर समाज, देश व प्रकृति पर पड़ा|
धरती बीमार हो गई चूँकि "ब्रह्म ही सत्य है और जगत मिथ्या" तो धरती का पेट फाड़ने से क्या होगा? वह भी तो हमारी तरह ब्रह्म में विलीन होने वाली है तो जब तक जी रहे हैं ऐसे करने में कोई बुराई नहीं है.......

तो बंधुओं बात यहाँ यह है कि हम यह नहीं कह रहे कि हमारे संत ऋषि मुनियों की सर्व मानव जाति की शुभ चाहना में कोई भी संदेह है...बिलकुल भी नहीं है बहुत से ऐसे महापुरुष थे जिनकी चाहना में शंका करना मूर्खता होगी और आज तक उन्होंने जो किया वह शायद ही हम कर सके.... वह एक आधार था जिस पर ही आगे का अनुसंधान हुआ|

तो गडबड़ी कहाँ हुई? चाहना में गडबड़ी थी/ कैसे करना में गडबड़ी थी या कार्य व्यवहार में गडबड़ी थी? क्यों यह धरती इतने शुभ चाहत और कार्य के बावजूद बीमार हुई?

गडबड़ी यह हुई कि हमने अस्तित्व को जैसा है वैसा पूरा नहीं देखा ("सही समझ" वास्तविकता को जैसा है वैसे ही देखने से आता है) अगर पूरा देखा होता तो जैसा है वैसा पूरा समझ पाते और समझा पाते और जिन्होंने पूरा देखा तब उनकी इतनी उम्र हो चुकी थी या जैसी भी स्थिति रही हो वे उस अनुभव को प्रमाणित नहीं कर पाये| 

आपको वो चार अन्धों वाली कहानी तो याद ही होगी सभी ने एक हाथी को अपने हाथ से स्पर्श कर कई तरह के निष्कर्ष निकाले|
एक ने हाथी के सूंड को पकड़ा तो उसे लगा कि यह तो सांप है|
एक ने हाथी का पैर पकड़ा तो उसे लगा कि यह खम्भा है|
एक ने उसकी पूछ पकड़ी तो उसे लगा कि यह तो रस्सी है|
फिर एक ने उसका कान स्पर्श किया तो उसे लगा कि यह सूपा है|
और सभी अपने अपने "मानना" में लगे रहे और उसे ही सही मानकर एक दूसरे से लड़ने लगे|
बस यही स्थिति है वर्तमान में इस संसार की|

अब यह तो आप ही तय करें कि
"ब्रह्म सत्य जगत मिथ्या" में जीना है 
कि 
"ब्रह्म सत्य, जगत शाश्वत" में ?
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अर्थात आपको विश्वास पूर्वक जीना है या अविश्वास में| यह आपको तय करना है क्योंकि ये शरीर यात्रा आपकी है और यह आपकी जिम्मेदारी है हम मात्र सूचना दे सकते हैं|

आप सभी का शुक्रिया कि आपने आज तक मुझे बेहद सम्मान से सुना| यह लेख थोड़ा कठोर है पर इसे आप सभी के साथ शेअर करना भी मुझे बेहद आवश्यक लगा| क्योंकि हर मानव "समझना" तो चाहता ही है| 
इस लेख में किसी भी प्रकार की त्रुटि के लिए क्षमा चाहूँगी| पेश किये गए विचार को कृपया माने नहीं स्वयं के अधिकार पर जाँचें|

सच्ची खुशी

एक अपने सबसे अच्छे मित्र का चित्रण कीजिये..उसके साथ बीते खुशनुमा पल याद कीजिये|
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चित्रण हो गया? चित्रण करके खुश हैं?
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अब बताये क्या आप उससे मित्रता उसकी सीरत (व्यवहार) देख कर किये थे?
कि सूरत देखकर किये थे?
कि धर्म/जाति देखकर किये थे?
बताइए?

फिर हम यह सब जाति, धर्म, मजहब हमारे जीने, मानव संबंधों में आड़े क्यों आता है? क्यों हम अपनी सच्ची खुशी इन सबके पीछे गंवाते हैं?
क्यों खुद भी दुखी होते हैं और औरों को भी दुख बाँटते हैं|
यहाँ क्या महत्वपूर्ण है?
व्यवहार या जात पात?
जो महत्वपूर्ण है उस पर हम क्यों काम नहीं करते?

मेरी पहचान

मेरी पहचान का मुख्य आधार क्या हो?
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मेरा धर्म, मेरी जाति,मेरा सम्प्रदाय, मेरा रंग, मेरा रूप, मेरा पद, मेरी भाषा?
या
"मानवीयता पूर्ण आचरण"?

भगवान????

......... ने इन लाखो लोगो को अकाल से क्यूँ पीड़ित होने दिया यदि वो भगवान या चमत्कारी थे? क्यूँ इन लाखो लोगो को भूंख से तड़प -तड़प कर मरने दिया?

{5}.......... के जीवन काल के दौरान बड़े भूकंप आये जिनमें हजारो लोग मरे गए।
(a) १८९७ जून शिलांग में
(b) १९०५ अप्रैल काँगड़ा में
(c) १९१८ जुलाई श्री मंगल असाम में

........... भगवान होते हुए भी इन भूकम्पों को क्यूँ नहीं रोक पाए?…क्यूँ हजारो को असमय मरने दिया?
यह एक कमेन्ट मैंने आज पढ़ा| इस पर प्रश्न उठे|
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प्रश्न-
क्या भगवान चमत्कारी होते हैं? क्या वे किसी भी भयंकर आपदा (भूकंप,ज्वालालामुखी) को रोक सकते हैं?
या फिर वे सभी रहस्यों से आपको मुक्त करते हैं और भयंकर आपदा का कारण और उसका निदान बताते हैं?
और ये जो भी आपदा आती है वह धरती के व्यवस्था के अर्थ में होती है या फिर धरती की तबाही के लिए?

प्रश्न-
भूख से मरने के लिए कौन जिम्मेदार है?
पदार्थ अवस्था, प्राण अवस्था (पेड़ पौधे और साँस लेती कोशिकाएँ), जीव अवस्था या फिर मानव अवस्था?

प्रश्न-
भगवान को क्या करना चाहिए?
क्या उनको हर भूखे के लिए खाना की व्यवस्था करनी चाहिए या फिर वे इन चार अवस्था ( पदार्थ अवस्था, प्राण अवस्था (पेड़ पौधे और साँस लेती कोशिकाएँ), जीव अवस्था, मानव अवस्था) में से एक इस आपदा के लिए जिम्मेदार अवस्था को "समझदार" बनने की प्रेरणा देनी चाहिए ताकि किसी भी आपदा के लिए वे आपस में सहयोग कर उससे निपटने के लिए सहज रूप से तैयार रहें|
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इसे जाँचे|

क्या आपके पास इन सब प्रश्नों के उत्तर हैं?

प्रश्न- १) जिस दिन इस धरती से तेल/पेट्रोलियम पदार्थ पूरी तरह खत्म हो जाएंगे उस दिन हम कैसे अपने वाहन चलाएंगे? विकल्प क्या है?
प्रश्न-२) धरती से पेट्रोलियम पदार्थ का पूरी तरह खत्म हो जाना किसके लिए समस्या और किसके लिए अवसर है?
प्रश्न-३) धरती में इस प्रकार के पदार्थ कैसे बनते हैं? इनको बनने में कितने वर्ष लगते हैं? और हम इसे धरती की व्यवस्था बगैर समझे निकाल कर कितने दिन में उपभोग करते हैं? हम सदुपयोग करते हैं या दुरुपयोग करते हैं?
प्रश्न-४) हम इन सब पदार्थ की कीमत चुकाते हैं? कि उस पदार्थ को निकाल कर हम तक पहुँचाने वाले की श्रम की कीमत चुकाते हैं?
प्रश्न-५) पेट्रोल का या ऐसे सभी धरती के पदार्थ का मूल्य क्या है?
प्रश्न-६) मूल्य और कीमत क्या अलग अलग बात है?
प्रश्न-७) अगर हम धरती से इस तरह कोयले, रेडिओएक्टिव , पेट्रोलियम पदार्थ निकलते रहेंगे तो धरती को क्या नुकसान हो सकता है?
प्रश्न-८) धरती को नुकसान होने की स्थिति में क्या मानव जाति, पशु पक्षी, पेड़ पौधे सुरक्षित रह पायेंगें?
इन सब समस्याओं का क्या समाधान है?
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क्या आपके पास इन सब प्रश्नों के उत्तर हैं? प्रश्न नंबर-४, ५ और ६ पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है?

महत्वपूर्ण क्या?

कितने मस्ती में रहते हैं ये नन्हें बच्चे..किसी बात की कोई फिक्र ही नहीं...मजा आ जाता है इनको देखकर
ये सिर्फ एक चीज में ही व्यस्त रहते हैं कि कैसे हमेशा खुश रहना है?
जैसे जैसे ये बड़े होने लगते हैं...इनकी सरलता जैसे कहीं खोने लग जाती है आखिर ऐसा क्या मिलता है इनको हमसे ऐसा... जो ये जैसे हैं वैसे नहीं रह पाते?
हमारी यंत्र/मान्यताएँ/ अपनापन-परायापन?

हमने (मॉडर्न सोसाइटी) कभी मानव को महत्वपूर्ण माना ही नहीं| उस नन्हें से बच्चे को हमने पैदा होते ही आया के हाथ सौंप दिया...
चूँकि हम कार्य कर रहे हैं उनकी हरकतों से परेशान होते हैं तो वीडियो गेम या टेलीविजन के सामने बिठा दिया|
थोड़े और बड़े हुए अच्छी शिक्षा के लिए उसे बोर्डिंग में भेज दिया...
हमने कभी यह ध्यान नहीं दिया कि वह नन्हा बच्चा क्या चाहता है?
उसे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची अदि सम्बन्धियों की जरुरत होती है| उनसे वह प्रेम मूल्य सहित सभी मूल्यों की चाहना होती है|
पर हमने उन्हें इन सब से वंचित किया|
हमने उसे अपने कार्यों से यह सन्देश दिया कि महत्वपूर्ण यन्त्र है| महत्वपूर्ण मान्यतायं हैं| महत्वपूर्ण धन है|
अब इस बच्चे से आप यह अपेक्षा नहीं करें कि यह आपके बुढ़ापे में आपको महत्व देगा|
वह भी जिसे महत्वपूर्ण माने हुए है वैसा ही करेगा|
बिमार पड़े तो अस्पताल, बोर हो रहे हो तो टेलीविजन..और आपकी अच्छी परवरिश के लिए "वृद्धा आश्रम"|
इसे माने नहीं जाँचा जाये और अगर इसमें कुछ सच्चाई नजर आती है तो देरी किस बात की..आज से बच्चों को अपना महत्वपूर्ण और कीमती वक्त दीजिए...वह बच्चा और घर के अन्य संबंधी भी आपकी अन्य जरूरतों से ज्यादा महत्वपूर्ण है|

Tuesday, June 10, 2014

अनुसन्धान का लोकव्यापीकरण

मानव का पुण्य रहा तभी यह अनुसन्धान सफल हो पाया|

इस बात को लेकर मैं बहुत भरोसा करता हूँ कि मानव इस प्रस्ताव को स्वीकारेगा| मुझे इस प्रस्ताव में सर्वशुभ का रास्ता साफ़ साफ़ दिखाई पड़ा| तभी मैं इस प्रस्ताव के लोकव्यापीकरण में लग गया| कब तक?आखरी साँस तक! जब तक मेरी साँस चलेगा, मैं इस पर ही काम करूँगा|

इस प्रस्ताव में इतनी बड़ी संभावना दिखाई पड़ती है कि आदमी जाति अपराध मुक्त हो सकता है, अपना पराया दीवार से मुक्त हो सकता है| यह दोनों हो गया तो धरती के साथ होने वाला अत्याचार समाप्त होगा| अत्याचार यदि रुका तो धरती अपनी बची ताकत से जितना सुधार सकता है वह सुधार लेगा|

लोकव्यापीकरण के क्रम में अनेक लोगों से मिलना हुआ| अनेक लोगों ने अपने अपने तर्क को प्रस्तुत किया|

“तुम बहुत आशावादी हो!” यह बताया गया|

निराशावादी से आपने क्या सिद्ध कर लिया, यह बताइए| मैंने उनसे पूछा|

“तर्क समाप्त हो गया तो हम नीरस हो जायेंगे|” यह आशंका व्यक्त की गई|

तर्क के लिए तर्क करने से नीरसता होती है या तर्क को प्रयोजन से जोड़ने से नीरसता होती है? यह प्रस्ताव तर्क को प्रयोजन से जोड़ने के लिए है| प्रयोजन सम्मत तर्क समाधान को प्रमाणित करता है| समाधान आने से नीरसता दूर होगा या व्यर्थ के तर्क बनाये रखने से नीरसता दूर होगा? केवल चर्चा करते रहने से नीरसता दूर होगा या उपलब्धियों से नीरसता दूर होगा? ऐसा मैंने उनसे पूछा|

“एक व्यक्ति की बात को कैसे माना जाए?” यह शंका बताई गई|

व्यक्ति के अलावा आपको पढ़ने/सुनने को क्या मिलेगा?
जो कुछ भी आज तक कहा गया है और आगे भी जो कहा जायेगा, लिखा जायेगा वह किसी न किसी व्यक्ति द्वारा ही होगा|

“बहुत सारे लोग तो भिन्न बात को मानते हैं?” यह बताया गया|

बहुत सारे लोग मिलकर ही तो इस धरती को बर्बाद किया|यदि कुछ लोग उस भिन्न बात को मना भी कर देते तो इतना बर्बाद नहीं होता| सब लोग उस “भिन्न बात “ को मान लिए तभी तो धरती बर्बाद हुई| सब लोग बर्बादी के रास्ते पर हो गए वह रास्ता ज्यादा ठीक है? या एक व्यक्ति सही की ओर रास्ता दिखा रहा है वह ज्यादा ठीक है?

(जनवरी २००७, अमरकंटक)

स्रोत- संवाद-२ (मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद पर आधारित)
प्रणेता-श्री ए. नागराज

क्या धरती पर आदमी रह पायेगा या नहीं?

"विज्ञानी यह बता रहे हैं धरती का तापमान कुछ अंश और बढ़ जाने पर इस धरती पर आदमी रहेगा नहीं| सन् १९५० से पहले यही विज्ञानी बताते रहे कि यह धरती ठंडा हो रहा है| सन् १९५० के बाद बताना शुरू किये यह धरती गर्म हो रहा है| यह सब कैसे हो गया? इसका शोध करने पर पता चला इस धरती पर सब देश मिलाकर २००० से ३००० बार परमाणु परिक्षण किये हैं| ये परिक्षण इस धरती पर ही हुए हैं| इन परीक्षणों से जो ऊष्मा जनित होते हैं उसको नापा जाता है| यह जो ऊष्मा जनित हुआ, वह धरती में ही समाया या कहीं उड़ गया? यह पूछने पर पता चलता है यह ऊष्मा धरती में ही समाया है जिससे धरती का ताप बढ़ गया| धरती को बुखार हो गया है| अब और कितना बढ़ेगा उसकी प्रतीक्षा करने में विज्ञानी लगे हैं| इसके साथ एक और विपदा हुआ प्रदूषण का छा जाना| ईंधन अवशेष से प्रदूषण हुआ| इन दोनों विपदाओं से धरती पर मानव रहेगा या नहीं, इस पर प्रश्न चिन्ह लग गया है|
धरती को मानव ने अपने न रहने योग्य बना दिया| मानव को धरती पर रहने योग्य बनाने के लिए यह अनुसंधान (चेतना विकास मूल्य शिक्षा/जीवन विद्या/मध्यस्थ दर्शन) प्रस्ताव रूप में है|"

स्रोत- संवाद-२ (मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद पर आधारित)
प्रणेता-श्री ए. नागराज

Wednesday, June 4, 2014

हम पढ़े लिखे समझदार और सुखी लोग

हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हमने इस धरती को बीमार किया| 
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हमने नदियों को दूषित किया| 
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हम धरती के पेट फाड कर कोयले/तेल/खनिज पदार्थ इतनी तेजी से निकाल रहे हैं ताकि इस धरती की गर्मी को पचाकर रखने वाला/धरती को संतुलन करने वाली व्यवस्था ही चरमरा जाये| 
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हम इस धरती को बर्बाद करने वाली चीजें बनाना सिख रहे हैं विज्ञान के नाम पर|
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हम परमाणु परिक्षण कर धरती को और भी ज्यादा गर्म कर रहे हैं ताकि धरती और मानव जाति और बाकी अवस्था सभी अपने मूल स्वरुप में आ जाये| जैसे पानी वापस हाइड्रोजन और ऑक्सीजन बन जाए|
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हमारे बच्चे अब शराब, जुआ और ड्रग्स लेने लगे हैं| मतलब अब संस्कारी हो चले हैं| और बाकी सब क्या कर रहे हैं यह भी आपको सूचना रूप में पता है|ठीक है आपके बच्चे ये सब नहीं कर रहे हैं पर और जो बच्चे/ युवा हैं जिनके साथ इनका उतना बैठना है वे तो इस दलदल में फंसे हैं| कब तक आप उसे इस भयानक वातावरण से बचाकर रख सकेंगें?
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हम अस्पताल में एक मृत शरीर को भी देने के लिए पैसे वसूलते हैं|
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हम लिंग परिक्षण करके कन्याओं की हत्या का पाप अपने सर लेते हैं|
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हम अपनी कलम का इस्तेमाल मानव जाति को एक करने की बजाय द्वेषपूर्ण वातावरण फ़ैलाने में करते हैं|
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं... क्योंकि हम दोहरे चरित्र में जीने के आदी हो गए हैं| परदे पर एक अच्छे इंसान का किरदार निभाते हैं जबकि असलियत में हम कुछ और ही होते हैं|
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हमारी फैक्ट्रियों का धुआं और राख धरती व वातावरण को जहरीला बना रहा है|
हम वे पढ़े लिखे समझदार और सुखी लोग हैं......जिनको सत्य का पता नहीं पर कर्म कांड में स्वयं के साथ अन्य को भी उलझा कर रखे हैं|
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हम सड़क बनाने के लिए हर भरे वृक्ष को बेदर्दी से काट कर उन पंछियों का जो बेजुबान है उनका आसरा छीन लेते हैं| धरती की सुरक्षा करने वाले वृक्ष को काट देते हैं|
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...जिसने शिक्षा को व्यवसाय बना लिया है| बजाय बच्चों में स्वयं के प्रति आत्मविश्वास, सम्मान और मानवीयतापूर्ण आचरण विकसित कैसे हो इस पर विचार करने के|
हम वे पढ़े लिखे समझदार और सुखी लोग हैं...जो आपस में ही एक घर के नीचे रहते (लड़ाई झगडा,अविश्वास, शंका) हैं जीते नहीं| 
हम वे पढ़े लिखे समझदार और सुखी लोग हैं...जो अपनी खुशी के लिए दूसरों पर आश्रित रहते हैं| अपना रिमोट कंट्रोल दूसरे के हाथ देकर खुद को समझदार और सुखी मानते हैं|
हम वे पढ़े लिखे समझदार और सुखी लोग हैं...जो कपड़े, पैसे, गहनों, गाड़ियों, बंगलों, तरह के व्यंजनों इत्यादि जो की निरंतर रहने वाली चीज नहीं है उससे निरन्तर रहने वाली चीज (सुख, सम्मान आदि) की अपेक्षा रखते हैं| 
हम पढ़े लिखे लोग समझदार और सुखी हैं...क्योंकि हमें "न्याय", "धर्म", "सत्य" क्या है? इसका ज्ञान नहीं फिर भी कोर्ट में न्याय कि जगह फैसले करते हैं|
हम वे पढ़े लिखे समझदार और सुखी लोग हैं...समाज सेवा के नाम पर अपनी ही सेवा कर रहे हैं|
हम वे समझदार लोग हैं जो अपने अपने खेतों को बेचकर मल्टीनेशनल कंपनियों के गुलाम बन रहे हैं|
हम वे समझदार लोग हैं जो देशी बीजों के बजाय संकरीत बीजों का प्रयोग कर स्वयं के साथ धरती और पशुओं को भी बर्बाद कर रहे हैं|
हम वे समझदार लोग हैं जो बेतहाशा कीटनाशक का प्रयोग अपनी फसलों पर कर रहे हैं ताकि बाकियों का जो हाना हो वो तो हो पर मेरी जरूरतों के लिए धन मिल जाये भले ही मुझे यह समझ नहीं कि मेरी जरूरतें इन्हीं समाज से पूरी होती है|
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क्या अब भी हमें लगता है कि हम समझदार हैं? कि "समझदार होने की आवश्यकता है? इसे स्वयं में जाँचे|

Wednesday, May 14, 2014

"जीवन नित्य उत्सव है|"

(एक संक्षिप्त चर्चा बच्चों पर, आप भी सादर आमंत्रित हैं) 
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आपने बच्चों को देखा होगा दिन भर खुश रहते हैं खेलते रहते हैं...वह ऐसा ही रहना चाहते हैं और हमें भी वैसा ही देखना चाहते हैं|


बच्चों को जब भी आप कुछ भी कहें सकारात्मक ही कहें, नकारात्मकता उनमें नहीं भरना है| बस सही की ही सूचना देवें| चाहे वह किसी भी माध्यम से हो (कविता, चित्र या फिर कहानियाँ)
अगर वे कुछ गलत करते हैं या फिर ऐसी चीजों की डिमांड करते हैं जैसे चॉकलेट, आइसक्रीम यहाँ पर उनकी इच्छा जरुर पूरी करें पर साथ में यह स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है और सही आहार क्या इस पर ज्यादा फोकस करें| साथ यह बात भी पूछी जाये कि क्या वे इससे "हमेशा/ निरन्तर खुश" रह सकते हैं? 
और निरन्तर खुश वे कैसे रह सकते हैं यह भी बताएँ| जैसे सहयोग करने से, आज्ञापालन करने से, संबंधों को पहचानने व निर्वाह करने से , सही संबोधन से, सही आहार, विहार, व्यवहार से, प्रकृति व जीवों के साथ न्याय पूर्ण कार्य व्यवहार करके आदि आदि... 
मानव संबंध और प्रकृति संबंध में से ज्यादा फोकस मानव संबंध पर करें...कोई भी भाषा (हिंदी, अंग्रेजी), गणित आदि के माध्यम से संबंध (७ संबंध) पर ही उनका ज्यादा ध्यान जाये यह प्रयत्न करें|

जैसा आप अपने साथ व्यवहार चाहते हैं प्रेम भरा, ठीक उनसे भी वैसा ही व्यवहार करें| 
प्रेम से ही चीजों को समझाएं|
डाँटना नहीं है| 
डाँटने से उनमें भय समा जाता है या फिर ऐसा भाव चला जाता है कि इस तरह से सामने वाले पर काबू किया जा सकता है| अब यह बात उनके जीने में आने लगती है| आगे आप कल्पना करने में सक्षम हैं और मेरा मानना है कि आप अपने बच्चे को भयभीत या क्रूर नहीं देखना चाहेंगे|

जीवन नित्य उत्सव है यह बात आपको शायद ठीक नहीं लगे ऐसा इसलिए क्योंकि हम मान्यताओं से चालित है मान्यताएं अच्छी या बुरी दोनों ही हो सकती है और इसी वजह से हमें सुख और दुःख एक सिक्के के दो पहलु लगते हैं| 

सही समझ की रोशनी में हम उसे पहचान सकते हैं|पर बच्चों के मामले में यह ध्यान रखें कि आप जो भी बात कहें उससे यह सन्देश जाना चाहिए कि हर क्षण हर पल उत्सव ही उत्सव है|
वह कैसे यह आपके विवेक पर निर्भर करता है| 
यह ज्यादा बेहतर होगा कि सही की सूचना पहले हममें ही आ जाये और खास बात जीने में आये क्योंकि बच्चे हमारा जीना देखते हैं| 
आगे इस पर हम और चर्चा करेंगें ...