Saturday, March 15, 2014

मेरा/ हर मानव का मूल लक्ष्य क्या है?

इस पर बराबर ध्यान बना रहे तभी हम अनावश्यक और आवश्यक वस्तुओं की समीक्षा और मूल्यांकन कर पायेंगें| 
नहीं तो हमारी स्थिति एक मकड़ी की तरह रहेगी जो एक दिन अपने ही बनाये जाले में फंस कर........जाती है|

जीवन नित्य उत्सव है...

पर कब?
हर क्षण लाखों कोशिकाएँ (प्राण अवस्था) नष्ट (पदार्थ अवस्था में रूपांतरित) हो जाती है निश्चित ही उनकी हर स्थिति उत्सवित होने वाली रहती है क्योंकि वह अनुशंगीयता (परिणाम व बीज) , स्वभाव (संगठन- विघटन, सारक-मारक)के अनुसार अपने धर्म का निर्वाह कर पा रही है|
पर वर्तमान में हमारी (हम ज्ञान अवस्था की) भ्रमित स्थिति है इसलिए हमारे लिए कोई खास दिन ही उत्सव का होता है पर जैसे ही हम "समझ" क्या है? इसे समझने/ जानने का प्रयास करते हैं तब हर क्षण हमारे लिए उत्सव का होता है (शंका मुक्त/ भ्रम मुक्त/ पीड़ा मुक्त/शिकायत मुक्त वाली स्थितियाँ और ३वस्तु का सम्पूर्ण ज्ञान(स्वयं, अस्तिव, मानवीयता पूर्ण आचरण) होने के कारण) ...यदि ऐसा नहीं है तो हमने स्वयं को "समझदार" होने का भ्रम पाल रखा है|
इसे स्वयं में जाँचने की आवश्यकता है...
यदि यह स्थिति मुझमें नहीं है इसका मतलब मुझमें लगातार सही पठन/ सही श्रवण/ सही देखना/सही समझने की आवश्यकता बनी हुई है|
आवश्यकता है कि नहीं? इसे स्वयं में जाँचा जाये|

Thursday, January 30, 2014

मध्यस्थ दर्शन की रोशनी में एक संक्षिप्त विचार

मध्यस्थ दर्शन की रोशनी में एक संक्षिप्त विचार व्यक्त करने का प्रयास 
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"मानव अवस्था/ज्ञान अवस्था को प्रमाणित करने में आदरणीय ए नागराज जी का प्रयास" 
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एक लोहे का परमाणु व अन्य किसी पदार्थ (ठोस, तरल, विरल/वायु) के परमाणु तभी प्रमाणित होते हैं जब वे सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी कर पाते हैं|यही वजह है कि पदार्थ अवस्था प्रमाणित है|
यही अवस्था बाकी ३ अवस्था (प्राण, जीव, मानव/ज्ञान) का आधार है| सोचिये यदि ये प्रमाणित नहीं होते तो क्या होता?

इसी तरह, प्राण अवस्था भी सार्वभौम व्यवस्था में भागीदारी कर स्वयं को प्रमाणित किया हर साँस लेती कोशिकाएँ इसका उदाहरण है|

जब ये दोनों अवस्था प्रमाणित हुई उसके पश्चात ही जीव अवस्था का प्रादुर्भाव हुआ और वह भी अपने अपने वंश के अनुसार सार्वभौम में भागीदारी कर स्वयं को प्रमाणित किया| इसका प्रमाण ही है जंगल, जमीन समृद्ध हैं| आपने यह कभी नहीं सुना होगा कि हाथियों ने जंगल में भारी तबाही मचाई य फिर शेर, बाघ ने इतने हिरन चीतल का शिकार कर घनघोर अपराध किया| हमें उनके आचरण पर पूरा विश्वास है| 
अब मानव अवस्था को देखते हैं तो मात्र एक, दो, तीन, मानवों के मानवीय आचरण या उनके प्रमाणित होने से क्या सम्पूर्ण मानव जाति/ अवस्था स्वयं को प्रमाणित कर पायेगी? जैसा कि बाकी तीनों अवस्था ने किया है?
नहीं ना?
जब तक एक एक मानव (समूची मानव अवस्था) अखंड समाज व सार्वभौम व्यवस्था में अपनी भागीदारी नहीं करेगा तब तक वह प्रमाणित नहीं हो सकती|
अत: यह हर प्रमाणित मानव का दायित्व /जिम्मेदारी बनता है कि वह प्रत्येक मानव को उसके जैसा बनाने का (गुणित होने का/ multiply) प्रयास करें| 

और इसी कार्य में ही आदरणीय ए नागराज जी (जिन्हें हम प्रेम से "बाबा जी" कह कर संबोधित करते हैं) लगे हुए हैं| उनकी सही मायने में पूजा करने या उन्हें श्रेष्ठ बताने का अर्थ है कि उनके जैसा बनने का प्रयास..|
जब तक यह स्थिति नहीं आती तब तक यह प्रयास करते जाना है क्योंकि इसके अलावा तो और कोई रास्ता नहीं दिखता निरन्तर सुख पाने का...ऐसा मेरा मानना है जानना शेष है|
जिन भाई बहनों की गति अच्छी है वे अन्य जिज्ञासुओं बंधुओं को सहयोग कर अपने दायित्व निभा ही रहे हैं| क्योंकि इसी तरह हम सब मिलकर ही एक दूसरे का सहयोग कर ही मानव अवस्था को प्रमाणित होने की स्थति में पहुँचा सकते हैं... 
हरी हर....

Friday, January 24, 2014

पीचडी

एक बच्चा जब अपनी पढ़ाई शुरू करता है माता-पिता के साथ वह भी इंजीनियर, डॉक्टर इत्यादि के सपने देखना शुरू करता है| (इन सब पदों के पीछे स्वयं व अपनों के लिए सुविधा का इंतजाम ही है|)
कुछ entrance exams (प्रवेश परीक्षा) के बाद उसका चयन होता है|
महँगी इंजीनियरिंग की पढ़ाई करता है, अगर उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं तो माता -पिता कर्ज लेकर अपने बच्चों को पढ़ाते हैं पर यह सभी को ज्ञात है कि ऐसे कॉलेजों का वातावरण कैसा होता है?
नतीजतन बच्चा सिर्फ आसमान में ही उड़ने के ख्वाब देखने लगता है|
उसे काफी प्रयास करने के बाद किसी अच्छे युनिवर्सिटी में एक अध्यापक की नौकरी मिलती है| अपने वह कई साल वहाँ पढ़ाने (तकनिकी ज्ञान) में लगाता है| तभी उसे अचानक पता चलता है कि इस जॉब (सम्मानीय शब्द) को बचाए रखने के लिए उसे पीचडी करना आवश्यक है| 
और पीचडी एक ऐसी बला है जो हर किसी के बस की बात नहीं है यदि पढ़ते पढ़ते ही (बगैर किसी ब्रेक के ) कर ली जाए तो ठीक है वर्ना...
मेरे जानकारी में ऐसे एक दो कुछ लोग हैं जो लगभग अपनी मानसिक संतुलन खोने की स्थिति में थे वह तो भावनात्मक सहयोग मिलने से ऐसी स्थति से स्वयं को निकाल पाये| 
अगर आप में क्षमता भी है तो भी आगे की प्रक्रिया इतनी जटील है (मार्गदर्शक प्रिय, हित, लाभ दृष्टि के चलते भावनात्मक शोषण करने में कोई कसर नहीं छोड़ते) कि ये खून के आँसू रुला डालते हैं| 
यदि आप अच्छी खासी रकम जुगाड़ कर सकते हैं इनकी (मार्गदर्शक की) चमचागिरी कर सकते हैं तो आपकी पीचडी थोड़ी आसान हो जायेगी| 
खैर आधी उम्र बीतने के बाद जब आपको पता चलता है कि यह डीग्री अत्यंत आवश्यक है तो उस समय हालात होती है "ना घर के ना घाट के"...आप ठगे से महसूस करते हैं|
४५-४६ की उम्र में भी पीचडी की तैयारियों में लगे हुए हैं और इसे पूरा करने के लिए कई बार लोग ऐसे कार्यों को हाथ में लेते हैं जो इनके अहं को ठेस पहुंचाते हैं क्योंकि इसने आसमान से जमीन का सफर करना तो सीखा नहीं है|
अब बताइए इस बच्चे ने जो अब प्रौढ़ हो चूका है ने क्या जिंदगी जिया?
ना कभी खेतों में श्रम किया ना कभी कोई जीवन जीने की कला सीखी, ना ही शादी कर पा रहा है (कुछ खुशकिस्मत हैं जिन्हें उनके हमसफ़र मिल गये|) ना ही माता-पिता को समय दे पा रहा है खुशियाँ तो मीलों दूर...
अब अगर वह निर्णय लेता है कि उसे यह जॉब छोड़ कर कुछ और करना है तो वह क्या करे?
श्रम (प्रकृति के साथ किया गया कार्य) करना सीखा होता उसके महत्व को जाना होता तो समृद्धि के भाव में जीता पर अब वह समृद्धि (जिस शब्द को उसने कभी जाना नहीं उसके लिए तो समृद्धि का अर्थ खूब सारा पैसा है) के लिए शॉर्ट कट तरीके खोजता है जो "स्वयं के प्रति सम्मान और स्वयं में आत्मविश्वास" तो कतई नहीं ला सकता|

अत: मेरी उन माता-पिता से विनम्र प्रार्थना है कि आप अपने बच्चों को जरुर इंजीनिअर, डॉक्टर इत्यादि की शिक्षा दें पर साथ ही उन्हें धरती व मिट्टी से प्रेम करना सिखाएं,श्रम व मानव/ संबंध इसके महत्व को भी समझाएं ताकि वे "स्वयं में आत्मविश्वास और स्वयं के प्रति सम्मान" के भाव में, मूल्यों में जीते हुए अखंड समाज व सार्वभौम व्यवस्था में अपनी भागीदारी कर सके|
इसके लिए आपको "सही समझ" क्या है? यह सूचना प्राप्त करनी आवश्यक है| कृपया ध्यान देवें| 
एक बच्चे को "समझदारी" देने की जिम्मेदारी सर्वप्रथम माता-पिता की, फिर परिवार, फिर आस पास के लोग उसके पश्चात आखरी में शिक्षक की होती है ...
अत: स्वयं "समझदार" बनें और अपने बच्चों को यह अच्छा वातावरण घर में देवें| 
और जो पीचडी कर रहे हैं उनके सगे-सम्बन्धियों/ मित्रों से निवेदन है कि उन्हें भावनात्मक संबल देवें और उनका हौसला बढ़ाते रहिये ताकि उन्हें अकेलेपन का एहसास ना हो और अपनी इस मंजिल को वे प्राप्त कर सकें|
All the best and good wishes for PhD students :)

हम निरंतर खुश क्यों नहीं?

चलिए इस प्रश्न का उत्तर ढूंढने का एक छोटा सा प्रयास किया जाये|
आखिर हमने अब तक अपनी मर्जी का ही तो सारा कुछ किया..पढ़ाई, व्यवसाय, नौकरी, सारे शौक गहनों, कपड़ों से लेकर गाड़ियाँ, घर, बीवी तक सब कुछ अपनी ही पसंद से चुना फिर भी ये खुशियाँ हमको निरंतर क्यों नहीं मिलती? या फिर कई मीलों दूर नज़र आती है| आखिर क्या कमी रह गई?

मेरा मानना है कि इन सबमें एक महत्वपूर्ण चीज छुट गई और वह है "संबंध"|
इसी संबंध व संबंधी की खुशियों के लिए सारी उर्जा लगा दी पर ना ही संबंधी खुश और ना ही स्वयं जिसने वह उर्जा लगाई|

आज हम सभी किसी ना किसी कार्यक्रम में व्यस्त हैं जैसे सामाजिक सेवा का कार्य, किसी संस्था में, शिविर में, खेती बाड़ी में इत्यादि|
आखिर  हुआ क्या ?
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"कार्यक्रम प्रधान हो गया और "समझ" व "मानव/संबंधी" पीछे छुट गया जो एक मात्र मेरे खुश रहने का आधार है| मेरे सारे कार्य-व्यवहार सिर्फ मानव/ संबंध के लिए ना होकर "सुविधा/कार्यक्रम " के लिए हो गया| मुझे यही वजह लगती है कि हम निरंतर खुश नहीं है| "
आपको क्या लगता है?

(इसे स्वयं में जाँचे, माने नहीं|)

Saturday, January 11, 2014

प्रमाणीकरण एक आवश्यकता

एक लोहे का परमाणु (पदार्थ अवस्था) भी आप कुछ भी कर लीजिए वह लोहा ही रहेगा| (परिणामानुशंगी)

एक आम का बीज, नीम का बीज, करेले का बीज (प्राणावस्था) भी किसी भी अनुकूल स्थिति में जब भी उगेगा तब जिस पौधे या पेड़ का बीज हो वही होगा| (बीजानुशंगी)

एक गाय, शेर या बिल्ली का आचरण भी उसके वंश के अनुसार होगा| एक गाय कभी शेर नहीं बन सकती और एक शेर कभी गाय नहीं बन सकता|

ये सभी प्रमाणित है और सार्वभौम व्यवस्था में अपनी सक्रिय भागीदारी निभा रहे हैं| ये किसी भी स्थिति में अपने आचरण का त्याग नहीं करते और ना ही इन्हें प्रमाणित होने पर कोई पदक दिया जाना है|

और मानव अवस्था/ ज्ञान अवस्था को देखिये...क्या आचरण होना चाहिए? मानव है तो मानवीयतापूर्ण आचरण से कम में चलेगा क्या? हर स्थिति में यह आचरण होना चाहिए कि नहीं? (संस्कारानुशंगी)
पर यहाँ तो यह हाल है कि एक फूलझड़ी (किसी आवेशित परमाणु/ मानव द्वारा) लगी नहीं कि सीधे रॉकेट बन आसमान में ब्लास्ट हो जाते हैं|
क्या हम एक लोहे के टुकड़े, एक चूहे, बिल्ली से भी गए गुजरे हैं कि अपने आचरण में रह नहीं सकते?
"प्रमाणित होना " कोई गोल्ड मेडल की प्राप्ति के लिए नहीं| यह एक आवश्यकता है| हर मानव की आवश्यकता है जैसे लोहे का कण कहीं भी हो लोहा ही रहेगा वैसे मानव कहीं भी हो उसे मानव के आचरण में ही होना चाहिए|
तभी हम सार्वभौम व्यवस्था में अपनी भागीदारी निभा पायेंगें/ भूमिका का निर्वहन कर पायेंगें|
वरना इस सृष्टि को हमारी कोई आवश्यकता भी नहीं है|
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जांचिए प्रमाणित होने की आवश्यकता है कि नहीं?

Thursday, November 14, 2013

व्यवस्था या अव्यवस्था?

एक एक ईंट को सजा कर घर बनाने में लग जाते हैं कई साल...
उसे तोड़ने में लगते हैं मात्र १ या ३ दिन|

शरीर की व्यवस्था बनाये रखने में लगते हैं प्रतिदिन संयम और सुन्दर भावों/ मूल्यों का बहाव...
शरीर की इस व्यवस्था को बिगाड़ने के लिए चाहिए मात्र एक ऋणात्मक आवेश (बुलडोजर चलाने जैसा)...
क्या चाहिए? व्यवस्था या अव्यवस्था? आपके हाथ में है सब कुछ|

ईर्ष्या, शिकायत भाव भी एक प्रकार का आवेश ही है इस प्रकार के ऋणात्मक भावों में जीने वाले मानव तो मुझे कभी आबाद नहीं दिखे...
क्यों ना हम इसके बजाय स्वागत और प्रेम भाव से भरे हुए हों?

अव्यवस्था से प्रभावित या पीड़ित होना भी एक प्रकार का आवेश ही तो है इससे प्रभावित होने की बजाय समझ, समाधान पर कार्य- व्यवहार किया जाए|

इतना महत्वपूर्ण मानव तन मिला है उसे इस तरह व्यर्थ में क्यों गवाएं?
क्यों ना इसकी सार्थकता/ सदुपयोगिता पर ध्यान दिया जाये?

Thursday, October 17, 2013

संवेदनशीलता



जी संवेदनशीलता ऐसा शब्द है जिसके बगैर आप किसी मानव को मानव ना कहकर हैवान कहेंगें...यदि यह संवेदनशीलता समझ के अनुसार चलने लगती है तो कहलाता है "संज्ञानशीलता"|
मैंने यह विषय इसलिए चुना क्योंकि  मैंने यह कई बार एहसास किया कि वर्तमान शिक्षा प्रणाली हमें कहीं बेहद दूर लेकर जा रही है...
मैंने फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी "मनुष्य शाकाहारी या मांसाहारी?"
इस पोस्ट को मैंने इसी ब्लॉग पर भी शेअर किया था..
http://life-chetna.blogspot.in/2010/01/blog-post_23.html

तो इस पोस्ट को एक मेरी फेसबुक मित्र ने चर्चा का विषय बनाया और उसमें आमंत्रित किया| यह सब एकदम से अचानक हो गया मैं इस डीबेट के लिए तैयार नहीं थी फिर भी शामिल हुई..

तो एक लंबी और मानसिक तनाव देती एक चर्चा से पहली यह बात निकल कर आई कि मनुष्य "सर्वाहारी" (Omnivorous) है और उसमें (मनुष्य में ) ऐसे सारे एंजाइम होते हैं जो मांस का पाचन कर सकते हैं...जब मैंने यह पूछा कि जैसे हम फलों का सेवन ऐसे ही बगैर पकाए कच्चा या फिर जूस निकाल कर कर सकते हैं वैसे क्या आप एक गाय, बकरी आदि का कर सकते हैं? तो कहा गया कि एक मानव को एक मांसाहारी की तरह नहीं रहना चाहिए वह एक सर्वाहारी है और हमें वह जो भी खाता है उसका सम्मान करना चाहिए...

और एक प्रश्न मुझसे पूछा गया कि एक जीव की हत्या से आपको दुःख होता है पेड़-पौधे में भी तो जीवन होता है उसे काटने में आपको दुःख क्यों नहीं होता?
अब देखते हैं "सर्वाहारी" मुझे जितनी सूचना प्राप्त है सर्वाहारी "Omnivorous" अर्थात जो सब कुछ खा सकता है..सब कुछ खा लेना मतलब तो और भी ज्यादा घिनौना हो गया...मैंने एक सर्वाहारी के अंतर्गत एक उदाहरण पढ़ा था "कॉकरोच" ...तो क्या हम अब कॉकरोच के तुल्य हो गए हैं? इतना भी मत गिराओ भाई मानव को...मांसाहारी तो फिर भी ठीक- ठाक है|

अच्छा तो एक दूसरा प्रश्न था पेड़ पौधे को जब हम काटते हैं तो वह पीड़ित नहीं होता उसे दर्द नहीं होता...जैसे एक जीव को होता है उसमें भी तो जान होता है...तो यह प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण है और इसका उत्तर भी है पर समय आने पर इस बातचीत होगी...इस प्रश्न को कृपया भूलें नहीं।

एक और कमेन्ट था..anything that your body can digest and gives you energy is food . any food that suits your taste can be and should be consumed to satisfy your hunger and drives arising due to it. Any food consumed in excess is harmful even "milk" or even "rice". God has given you brain, chose your own food instead of debating here. Best practices are to learn from others mistake. Never consume food that has an history of harming human race (people similar to you). Its not about being VEG or NONVEG its about chosing the best amongst what you have been bestowed by the almighty.

God has given you brain--- ठीक है भगवान ने आपको दिमाग दिया है (भगवान कौन है कैसा है? कभी देखा है?) चलिए ठीक है...अब आपको एक विकसित दिमाग मिल ही गया है तो दूसरों की गलती देख कर सीखने के लिए? कि समझ पूर्वक चलें ताकि गलती हो ही ना...ध्यान से सोचने की बात है..जब आपसे कोई यह कहे कि मैं हर दिन एक सेब या केला सबेरे सबेरे खाता हूँ तो आप खुश होंगे और उसकी प्रशंसा भी करेंगें कि वाह भाई तुमने तो अपनी सेहत का अच्छा ध्यान रखना सीख लिया...पर कोई आपसे यह कहे कि मैं रोज सबेरे एक गाय/ बकरे/मुर्गी या कुत्ता/बिल्ली/छिपकली (जैसा चीन में होता है) का रोज एक गिलास खून (जूस) पीता हूँ तो आप क्या कहेंगें? यह तो पागल है या फिर हैवान कहेंगें ना?

जब मैंने ऐसा ही प्रश्न किया तो उत्तर मिला..."don't compare sabji with jeew ka khoon... there are medicines and drugs that you intake made from raw blood cells of animals.. there is a lot to learn.. first understand that an omnivorous is actually a herbivorous who can eat and digest non veg too!"
एक गिलास सब्जी या फल की रस के बजाय मैं अगर एक गिलास जीवों का खून पीने को कहूँ तो वे गुस्सा हो जाते हैं..इसका मतलब है कि फलों का रस पीना हमारे लिए "सहज" है अत: स्वीकार्य है और जो सहज नहीं है वह हमें स्वीकार नहीं..यही पीड़ा का कारण है...

अब ये कहते हैं कि दवाइयों में इनके खून का प्रयोग होता है..ये तो और भी भयंकर बात है...और हमने कई बार बताया भी नहीं जाता कि आपको जो दवाइयाँ दी जा रही है वह "शाकाहारी" या "मांसाहारी" है| मुझे इस प्रकार के प्रयोगों की आवश्यकता भी नहीं लगती| हमने जिस चीज के लिए जीवों की हत्या की उसके साथ कई प्रकार के अमानवीय प्रयोग कर रहे हैं वह बेहद दुखद है| कॉस्मेटिक के लिए इन बेजुबानों पर प्रयोग किये जाते हैं...तो जो चीज चाहिए वह पौधों से भी मिल जाता है..जैसे "ओमेगा ३ " के लिए एक मछली शायद "साल्मोन" को मारा जाता है जबकि यह ओमेगा ३ "अलसी" के बीज में मिल जाता है...

ये दुहाई देंगें कि मानव जाति की सुरक्षा के लिए ऐसा करना हमारी मजबूरी है...पर यह मजबूरी नहीं यह पूरी तरह से लाभ दृष्टि है..और इस दृष्टि के चलते ये कब "मानव " को मार कर दवाइयाँ बनाने लगे कह नहीं सकते...इनमें दया नाम की कोई चीज नहीं दिखती..

जब मैंने कहा इस जीव की आँखों में झांको फिर तुम कभी उसे मार नहीं सकते...तो ये Higher study बच्चे का कमेन्ट देखिये..."gulab ka fool kabhi apne gamle se tod kar bhagwaan ko chadhaya hai? mujhe to bahut dukh hota hai.. haan par bazaar se khareed ke kayee baar chadhaya hogaa.. mujhe bazaar me khade bakre ki aankh me to kuchh nazar nahi aataa shayad main kahaniyaa achhe nahi bana pata isliye :P "

अब इस मानव की दृष्टि देखिये  सबसे पहले तो उसने सामने वाले की भावना को समझने का प्रयास ही नहीं किया...और इन्हें बाज़ार में खड़े बकरे में केवल अपना भोजन नज़र आता है..उसने कभी यह समझने का प्रयास नहीं किया कि यह बेजुबान जीव में अगर कुछ हरकत हो रही है तो वह क्यों? आखिर उसमें ऐसा क्या चीज है..हम सबके पास कोई ना कोई पालतू पशु होंगे या फिर रोज आपके घर के पास एक गाय खड़ी होती है...इस इंतज़ार में कि उसे कोई एक रोटी दे दे..उसकी आँखों में मुझे तो एक चमक नज़र आती है...पाबला भैय्या (ब्लॉगर) का मैक देखो कितनी बदमाशी करता है.. भैय्या कितने बार उसकी पोस्ट शेअर करते हैं  आखिर कुछ तो है ना उस जीव में कि हम उससे प्रेम करते हैं और यदि आप उसे भाव को नहीं समझ सकते तो यह "मानवीय गुण है अमानवीय" इसे जांचने की जरुरु़त है|

इस चर्चा ने मुझे यह सोचने पर और मजबूर कर दिया कि हम बच्चों को क्या शिक्षा दे रहे हैं? जितनी ज्यादा डीग्री उतने ही असभ्य होते जा रहे हैं? संस्कार तो किसी में नहीं दिखता..अगर अच्छी प्रवृत्ति भी है भी तो वह उनके खुद के पिछले शरीर यात्रा और परिवार से मिली शिक्षा के कारण ही है ऐसा मेरा "मानना" है "जाँचना" अभी शेष है..वर्तमान शिक्षा प्रणाली से तो यह असम्भव है...

मुझे याद आता है ९वी कक्षा में हमें एक मेढक दिया गया था डिसेक्शन के लिए...उसे हमारे ही सामने क्लोरोफार्म से बेहोश किया गया..फिर सबके ट्रे में एक एक मेढक...बेहद दुखद क्षण था..मैंने तो यह अपने इच्छा विरुद्ध कार्य किया था..मेरी एक सहेली थी अंजू उसके ट्रे के मेढक को होश आ गया वह अपना मुँह खोलने बंद करने लगा उसे देख अंजू घबरा गई उसने कहा" मैम इसे होश आ गया..." इस टीचर ने जो कहा वह मुझे आज तक याद है.."उसका हार्ट काट कर फेंक दो"

"उसका हार्ट काट कर फेंक दो"? यह वाक्य जैसे तीर सा चुभा..क्या यही हमारी जिम्मेदारी है हम कितने गैर जिम्मेदार हो गए हैं? यह शिक्षक मुझे आज तक याद है क्योंकि उसने एक गैर जिम्मेदाराना बयान व्यक्त किया था..

और मुझे इसकी अनावश्यकता का अहसास तभी हो गया था..हमें इसकी आवश्यकता ही नहीं..छोटी सी कक्षा से बच्चों से डिसेक्शन करवाना उसे अमानवीयता और असंवेदनशील बनाने की ओर पहला कदम है...हर बच्चा डॉक्टर नहीं बन सकता..और जो बच्चे मेडिकल की पढ़ाई कर रहे हैं उन्हें प्राकृतिक या फिर किसी दुर्घटना में शिकार हुए मृत जानवर का शरीर उपलब्ध करवाया जा सकता है|  

कुल बात वर्तमान शिक्षा प्रणाली कैसा मानव तैयार कर रही है यह बेहद चिंतनीय विषय है इस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है..
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“The simplest acts of kindness are by far more powerful then a thousand heads bowing in prayer.”
― Mahatma Gandhi

(चित्र गूगल से... आभार...)

Saturday, September 28, 2013

संगीत


एक संगीत सभा का महाआयोजन था..वहाँ एक से बढ़ कर एक वाद्य यन्त्र, गायक और नृत्य में पारंगत महारथी थे .. आयोजन शुरू हुआ..पर यह क्या सब अपनी अपनी धुन में यंत्रों को बजाने लगे, सभी गायक अपने- अपने गीत गाने लगे और नृत्य में पारंगत सभी महारथी अपने अपने पसंदीदा धुनों पर नृत्य करने लगे...
अब आप इसे संगीत कहेंगे या शोर?
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इस धरती में रहने वाले लोगों का भी यही हाल है..ये सभी "सत्य" की परिभाषा अलग अलग माने बैठे हैं. बाकी ३ अवस्था (पदार्थ, प्राण और जीव ) तो उस वास्तविकता/ सत्य के संगीत में रंगे हुए हैं पर जब से मानव अस्तित्व में आया तब से संगीत दिन ब दिन बेसुरा होता जा रहा है...
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जबकि वास्तव में "सत्य" एक ही है उससे निकलने वाली ताल भी एक ही है..यह जैसा है वैसा ही रहेगा ...यह पहले भी था, अब भी है और कल भी ऐसा ही रहेगा..यह "नित्य वर्तमान" है.

हम सभी को इस ताल के अनुसार होना है तभी एक मधुर संगीत का सृजन होगा और इस अस्तित्व द्वारा आयोजित संगीत सभा की कभी ना खत्म होने वाली एक शानदार शुरुआत होगी ....


(चित्र गूगल से..आभार) 

Friday, September 13, 2013

टापू और मानव

समंदर के बीच एक छोटा सा टापू था जिसमें मुश्किल से कोई १००-२०० लोग रहते थे.
इस सुन्दर टापू में आराम से खुशी खुशी इनका गुजर बसर चल रहा था..समस्याएँ थी पर इतनी कि वह गौण की जा सकती थी...
इनमें से कुछ लोगों के २ समूह थे जो इतने में खुश नहीं थे. वे कुछ और करने की इच्छा रखे हुए थे.
एक समूह के लोगों ने उस टापू में एक जगह जिज्ञासावश खोदना शुरू किया उन्हें कुछ चमकीले पत्थर मिले उसे अन्य लोगों को दिखाया तो कईयों ने उस एक चमकीले पत्थर के बदले उन्हें बहुत सारी खाने - पीने की वस्तुएँ दी फिर धीरे धीरे वस्तु के बदले कोई कागज जैसा प्रतीक आ गया.
धीरे धीरे लोग उस चमकीले पीले पत्थर को आभूषणों की तरह पहनकर गौरान्वित महसूस करने लगे.
दूसरा भी एक समूह था जो प्रकृति की सुंदरता, उसके अद्भूत तालमेल और मनुष्य कौन और उसका प्रयोजन क्या...इन सब रहस्यों का पता करने निकले, उन्होंने तो पहले इस टापू को देखा फिर एक छोटी सी नाव बनाकर समुद्र सैर के लिए निकल गए...कई मीलों की यात्रा के बाद उनको एक और सुन्दर और प्राकृतिक संसाधनों से भरा समृद्ध टापू मिला और भी टापू उन्होंने देखा जिसमें केवल पत्थर मिट्टी थे...खैर इस यात्रा में वे प्रकृति के रहस्यों से वाकिफ हुए और मानव का प्रयोजन क्यों..यह बात समझ आई.
जब वे वापस अपने टापू पर आये तो ये देखकर दंग रह गए कि यह सुन्दर टापू अब खदानों में तब्दील हो चूका था...पेड़- पौधे और जीव जंतु के लिए शायद ही कोई जगह बची थी...सभी तकलीफ़ में थे...जगह जगह खदानों में पानी भरने लगा था..लोग चमकीले पीले पत्थर के पीछे पागलों जैसे आपस में लड़ने लगे ...लोग भूख से तड़प रहे थे...दूसरे समूह को यह सब देखकर पीड़ा हुई और वे इन सबका कारण भी समझ रहे थे...
अब इन भले और समझदार मानव के समूहों ने अन्य लोगों को समझाने की बेहद कोशिश की.
कुछ लोग समझ के क्रम में आने लगे और वे सब साथ मिलकर इस टापू के लोगों में शिक्षा के माध्यम से जागरूकता फ़ैलाने का प्रयास किया साथ ही इस टापू को पहले जैसा बनाने का प्रयास भी कर रहे थे.
चूँकि लालची व भ्रमित मानवों का कार्य कुछ ज्यादा ही खतरनाक हो चला था अब भी वे इस चमकीले पीले पत्थर के मोह में ही थे...समझदार मानव के समूह ने देखा कि अब यहाँ और नहीं रहा जा सकता तो उन्होंने एक बड़ी सी जहाज तैयार की और सभी लोगों को साथ चलने को कहा किन्तु भ्रमितों ने ध्यान नहीं दिया.
समय की कमी को देखते हुए भले मनुष्यों के समूहों ने जितने मुसाफिर जाने को तैयार थे उन सबको साथ लेकर अपनी अगली यात्रा शुरू की और उस सुन्दर टापू पर पहुँच गए और उनके समझदारी पूर्वक कार्य व्यवहार से वह टापू और भी ज्यादा समृद्ध और लोग निरंतर सुखी समृद्ध हो गए..उन्हें किसी बात की पीड़ा नहीं थी क्योंकि ये हर घटना के नियम को जान चुके थे और उसके अनुसार ही उनका मानना, पहचानना और निर्वाह करना हो रहा था. 
और इधर पुराने वाले टापू का दृश्य कुछ इस प्रकार था...
टापू पानी में डूब चूका था..पैर रखने की भी जगह नहीं थी ...वे चमकीले पीले पत्थर को अपने सीने से चिपकाये मृत्यु की गोद में सामने लगे. 
आज भी यदि कोई उस टापू के पास से कोई गुजरता है तो दूर से उनको कुछ चमकीली चीज दिखती है ये उन्हीं मरे हुए लोगों की भटकती आत्मा (जीवन) है जो अब कई सदियों तक इस टापू पर दोबारा मानव शरीर तैयार होने तक का इंतज़ार करते रहेगी...भटकती रहेगी.
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(नोट- यह एक काल्पनिक कहानी है )