Monday, May 30, 2022

विकास?

विकास (अपनी मान्यताओंनुसार) के नाम पर अपने फायदे के लिए गाँव उजाड़े गए.....

अपने फायदे के लिए जंगलों को उजाड़े गए व उजाड़े जा रहै हैं....

अपने फ़ायदे के लिए शहर बनाया ताकि उसके कारखानों में ग्रामीण लोगों को काम पर लगाया जाए, 

शिक्षा ऐसी रखी गई ताकि सब उन कंपनियों के गुलाम बने....

अब परिणाम देखो किसी को भी ठीक से सभाल नहीं पा रहे हैं।

शहर में एक आदमी बहुत अमीर और खेत बेचकर शहर आकर उनकी नौकरी करने वाला मिडिल क्लास या गरीब!

एक के पास लाखों करोड़ों की नौकरी, एक के पास वह पढ़ाई करके भी बेरोजगारी!

क्या यही समाज की स्थापना करनी थी? क्या यही सबका सपना था?

अभी भी वक्त है जो जहाँ है उनको वहीं ऐसा वातावरण दिया जाए जिससे उनका सम्पूर्ण विकास हो।

किसी को मत उजाड़ो, आज की तारीख में ये शहर, महानगर किसी को नहीं सभाल सकते जबकि गाँव अब भी सारे शहर के लोगों के पेट भरता है।

गाँव में किसी परिवार में सबके लिए काम होता था/है।कोई बेरोजगार नहीं होता।

आदिवासियों का घर उनका जंगल है। उनका रोजगार का वह साधन है उसे संसाधनों के लिए मत उजाड़ो।

हमारे कॉन्क्रीट के शहरों में उनके लिए कुछ भी नहीं सिवाय शोषण के।

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उद्योगों की भी आवश्यकता है लेकिन वह आवश्यकता के हिसाब से उत्पादन होना चाहिए यह नहीं कि अपने उत्पादन को खरीदने के लिए विज्ञापनों के माध्यम से बाध्य किया जाए। 

इसके क्या क्या दुष्परिणाम है यह हम सबको विदित है। 

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महानगरों की उपलब्धि प्रधानतः महत्वाकांक्षा संबंधी है गाँवों की उपलब्धि प्रधानतः सामान्याकांक्षा है पर अभी का वातावरण जागृति के लिए नहीं है अतः इनका दुरुपयोग ज्यादा है सदुपयोग कम। अभी ये तीन उन्माद(भोगोन्माद, कामोन्माद और लाभोन्माद) को समर्पित है।   

अब न तो शहरों को मिटाया जा सकता है ना गाँवों को तो अब सार्थकता कैसे हो?

बस जागृति का वातावारण तैयार हो, धीमा धीमा प्रयास चल ही रहा है लोगों की मानसिकता में परिवर्तन होते ही स्वमेय ही सभी सामान्यकांक्षा (रोटी, कपड़ा, मकान) महत्वाकांक्षा (दूरसंचार, दूरश्रवण, दूरगमन) सम्बंधी वस्तुएं उसके लिए समर्पित हो जाएंगी। चीजें खुद ब खुद संवर जाएगी।

और यह शहरों व गांवों की सुंदरता होगी। और प्रकृति में इसका असर दिखेगा। प्राकृतिक संसाधनों का आवर्तनशीलता का ध्यान रखते हुए सदुपयोग होगा।

और यही वातावरण वास्तविक विकास (जीव चेतना से मानव चेतना में संक्रमण) के लिए योगदान होगा।

Sunday, March 22, 2020

कृतज्ञता

आज 22/03/2020 को शाम 5 बजे से हम भारत के नागरिक प्रधान मंत्री के आह्वान पर स्वास्थ्य कर्मचारी जो अब कोरोना जैसी भयंकर महामारी का सामना करने जा रहे हैं, के प्रति कृतज्ञता का भाव व्यक्त करने हेतु ताली, थाली, घंटी या शंख का प्रयोग कम से कम 5 मिनिट तक करने को कहा गया था।
व्हाट्सएप पर महिलाओं ने एक धुन शेअर किया था और उसे प्रयोग करने को कहा गया... इस धुन में शंख और मंदिर की  घण्टियों की आवाज थी।
बस हम सभी परिवार वालों ने उसे शाम 5 बजे से बजाना शुरू किया, मेरी माता जी ने एक थाल और पिताजी ने शंख बजाना शुरु किया और मैंने ताली।
इन सब ध्वनि और आगे जो भी वातावरण हम सभी सामना करने जा रहे हैं और प्रकृति माँ के प्रति कृतज्ञता का भाव आते ही आँखों से आँसू बहने लगे। सबसे अपने आंसुओं को छुपाते हुए हमने ताली बजाना जारी रखा हुआ था और विचार भीतर में चलने लगे....
मन ही मन प्रकृति माँ से हम मानव जाति के द्वारा किए गए कार्य -व्यवहार से क्षमा माँग रहे थे पर साथ ही माफ नहीं करने को भी कह रहे थे। मानव जाति कैसे और कब सबक ले इन सबसे? कैसे हमें समझ में आ जाए कि हमें प्रकृति के साथ कैसे रहना है तब तक हमें प्रकृति तो ऐसे ही सबक सिखाएगी। और प्रकृति तो नियम अनुसार ही चलती है किसी के साथ कोई भेदभाव नहीं।
और दूसरी ओर इटली में हो रही घटना और यही अगर भारत में देखने को मिले? सोचकर ही रूह कांप उठी।
कुछ समझ नहीं आ रहा था कि प्रकृति माँ से क्या माँगे, क्या विचार व्यक्त करें।
घर के सामने दो बड़े आमों के पेड़ और कोयल की कूक... दोनों हाथ आपस में जुड़े कृतज्ञता के अलावा कोई भाव नहीं आ रहे थे।
आशा है कि आने वाले मुश्किल घड़ी का हम सब समझदारी और बहादुरी से सामना करें।
आप सभी को मेरा सादर प्रणाम.....
जिन्होंने भी मानवीयता का दामन कठिन स्थिति-परिस्थिति में नहीं छोड़ा उन सभी भाई बहनों के प्रति दिल से कृतज्ञता और धन्यवाद का भाव....
यही मानवीय दृष्टि आपको उच्च स्तर का बनाती है। विपरीत परिस्थितियों में ही स्वयं की स्थिति का आकलन हो पाता है।

Thursday, March 5, 2020

आवर्तनशील खेती और इसकी आवश्यकता

वर्तमान में हम मानव जाति यह अब समझ ही चुके हैं कि धरती की व्यवस्था हमारी गलतियों की वजह से दिनों दिन बिगड़ती जा रही है। इससे मानव जाति के समक्ष बहुत बड़ी चुनौती आ गई है कि कैसे स्थिति को नियंत्रण में लाया जाए ताकि यह धरती की व्यवस्था बनी रहे। इसमें मानव जाति की ही सुरक्षा है।
वनों की अंधाधुंध कटाई हमारी गलतियों में एक सबसे बड़ी गलती है। असंतुलित मौसम चक्र इसका उदाहरण है। 

इसके समाधान में कई विकल्प हो सकते हैं, एक विकल्प आवर्तनशील खेती के रूप में परम श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी (प्रणेता: मध्यस्थ दर्शन, सह अस्तित्ववाद) ने बताया था। इस खेती की सहायता से हम धरती के संतुलन को बनाए रखने में पूरक हो सकते हैं। 

आवर्तनशील खेती में मुख्यत: तीन भाग होते हैं। 

  • पहले भाग में घर में खाने वाले फसल जैसे गेहूँ, दाल, चावल, अनाज आदि लगाया जाता है। 
  • दूसरे भाग में फल, सब्जी, मसाले व गाय का चारा (नैपियर, जिंजवा, बरसीम घास ) लगाया जाता है।
  • तीसरे भाग में जलाऊ लकड़ी, इमारती लकड़ी जैसे बाँस, साल, सागौन आदि लगाया जाता है। सुखी पत्तियाँ खाद बनाने के काम आती है। यह वृक्ष पर्यावरण संतुलन में एक बड़ा योगदान करती है। इसी भाग में ढलान की तरफ एक तलाब होता है जिससे पानी का स्रोत हमेशा बना रहता है। 
तीसरे भाग में ही हम गौशाला रख सकते हैं जिससे दूध का उत्पादन होता है तथा गोबर से एक अच्छी उपजाऊ जमीन तैयार करने में मदद मिलती है। इसी भाग में गाय के लिए चारा (बरसीम घास) भी लगाया जाता है। 
इस खेती का प्रयोजन है, पहला आवश्यकता से अधिक का उत्पादन अर्थात पहले स्वयं की आवश्यकता के लिए तो उत्पादन हो ही जो अधिक हो उसे संबंधियों को वितरित कर दिया जाए। 
(हर परिवार में आवश्यकताएं समझ आने पर आवश्यकता से अधिक उत्पादन सहज है जिससे समृद्धि का भाव आता है।)
दूसरी आवश्यकता शेष अवस्थाओं (पदार्थ, प्राण व जीव)  में संतुलन बनाए रखने में सहायता मिलती है।

इस प्रकार की खेती में किसी भी प्रकार का रासायनिक खाद व रासायनिक कीटनाशक का प्रयोग नहीं किया जाता।

वर्तमान में कई किसान भाई इस विधि को अपनाए हुए हैं जिनमें से एक नाम बांदा जिले के श्री प्रेमचंद भैया जी हैं जिनके कई विडियो यू ट्यूब में उपलब्ध है। आप देख सकते हैं।  

आशा है कि अन्य किसान भाई भी आवर्तनशील खेती से जुड़ी जानकारियाँ भाई बहनों से शेअर करेंगे जिससे जिज्ञासु भाई बहनों को मदद मिलेगी।
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आवर्तन/ आवर्तनशील/आवर्तनशीलता/आवर्तनशील विधि/ आवर्तित शब्द के अर्थ को अधिक स्पष्टता से समझने के लिए इनके परिभाषाओं को भी एक बार देख लेते हैं:-

➡️आवर्तन 
- दोहराने वाली क्रिया ।   
- क्रिया  (श्रम, गति परिणाम) परम्परा।  
- यथास्थिति, उपयोगिता पूरकता सहज परम्परा। 
- पदार्थावस्था-परिणामानुषंगी। 
   प्राणावस्था-बीजानुषंगी। 
   जीवावस्था-वंशानुषंगी। 
   ज्ञानावस्था-संस्कारानुषंगीय परम्परा में आवर्तनशील हैं। 
- ऋण धनात्मक गुण स्वभाव प्रकाशन सीमा गतिपथ।

➡️ आवर्तनशील 
- पदार्थावस्था से प्राणावस्था, प्राणावस्था से पदार्थावस्था आवर्तनशील।

➡️ आवर्तनशीलता   
-   जागृत मानव विकसित चेतना विधि से ही पदार्थ, प्राण और जीवावस्था के साथ उपयोगिता पूरकता सहज प्रमाण।
- अन्य तीनों अवस्थाएं अपने - अपने यथास्थिति में उपयोगी अग्रिम अवस्था के लिए पूरक होना ही आवर्तनशीलता है।

➡️ आवर्तनशील विधि   
- ज्ञान, विवेक, विज्ञान, जागृत मानव परम्परा सहज कार्य व्यवहार फल परिणाम ज्ञान सम्मत होना आवर्तनशीलता।
- मानवीयतापूर्ण आचरण संगत कार्य व्यवहार। 

➡️ आवर्तित 
- धरती सूर्य के सभी ओर आवर्तित है।
- परमाणु में मध्यांश के सभी ओर परिवेशों में कार्यरत सभी अंश आवर्तित रहते हैं। इसी के साथ प्रत्येक अंश अपने घूर्णन गति में रहते हैं इसे भी आवर्तन संज्ञा है और धरती भी अपने घूर्णन गति सहित आवर्तनशील है।

* संदर्भ:परिभाषा संहिता, संस्करण : 2016, पृष्ठ नंबर:38-39
* अस्तित्व मूलक मानव केन्द्रित चिंतन सहज मध्यस्थ दर्शन (सहअस्तित्ववाद)
* प्रणेता - श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी  

श्रद्धेय ए. नागराज जी ने "आवर्तनशील अर्थशास्त्र" पर एक पुस्तक भी लिखा हुआ है जिज्ञासु गण उसका अध्ययन कर सकते हैं। 
धन्यवाद  
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समस्त सूचना अनिल भैया जी, पूनम बहन जी, बसंत भैया जी  (ग्राम हिंगनाडीह, अभ्युदय क्रमांक 3) व अन्य स्रोतों से प्राप्त सूचनाओं पर आधारित है।

प्रतिकात्मक चित्र संयोजन: गूगल की मदद से, आभार
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आपके विचारों व सुझावों का स्वागत है।

Saturday, May 25, 2019

जीत या हार?

ऐसा लग रहा है कि हम जनता जीत के भी हार गए हैं (ये मेरा अपना मानना है, अभी जागृतिक्रम में हूँ व समझने का प्रयास कर रही हूँ )। अगर यह जीत का आधार अच्छे कार्य होते तो उनको भी स्वयं में विश्वास होता। पर यहाँ जीत के लिए जाति, धर्म, संप्रदाय, देश सुरक्षा का प्रयोग करना पड़ा...और सबसे ज्यादा "भय कारक" (fear factor) दिखा। और हर बार यह प्रयोग काम नहीं करेगा।

कोई भी अच्छा राजनेता कोशिश करता है कि जनता उसे उसके अच्छे कार्यों पर उसे वोट करें न कि गलत आधारों पर... पर जैसे ही उसे सत्ता का लालच दिखता है तो वह उसे हथियाने के लिए कोई भी तरीका अपनाता है। 
उदाहरण- हाल ही के विधानसभा के चुनाव में एक बेहतर कार्य करने वाली पार्टी (आपके मानने/ मान्यता के अनुसार ) बूरी तरह से हारी।
इतना अच्छा कार्य ( उनकी मान्यतानुसार) करने के बावजूद उस हार से लगभग सभी टूट चुके थे तो इस बार विकास के बजाय चुनाव के मुद्दे का आधार कुछ और ही हो गया। क्यों? क्योंकि उन्होंने यह मान लिया कि हम जनता को अच्छे काम से ज्यादा कोई मतलब नहीं होता। हम सिर्फ तात्कालिक वातावरण से प्रभावित होकर वोट देते हैं।

आगे उम्मीद है कि हम जनता मूलभूत आवश्यकताओं (शिक्षा -चेतना विकास हेतु, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, उत्पादन जैसे विषयों ) पर जो वास्तव में बेहतर व गंभीरता से कार्य कर रहे हैं उन्हें आगे काम करने का अवसर देंगी। 

जैसे हम (जनता) वैसी हमारी सरकार :)
आप सभी को बहुत बहुत बधाइयाँ :)
आशा है कि जनता द्वारा चुनी गई सरकार आवश्यक मुद्दों पर बेहतर कार्य करेंगी, साथ ही यह भी निवेदन है कि अन्य पार्टी जो भी अच्छे कार्य कर रहे हैं उसे सहयोग दिया जाए, यदि कोई योग्य व्यक्ति अच्छा कार्य करे तो उससे महत्वपूर्ण पद दिया जाए।

हर हाल में "मानवीयतापूर्ण आचरण" के लक्ष्य को केंद्र में रखने व कैसे हमारा देश अन्य देशों के लिए "मानवीयतापूर्ण आचरण" का एक अच्छा उदाहरण/ स्रोत बने इस पर गंभीरता से सभी को मिल जुल कर कार्य व सहयोग करने की आवश्यकता है।  

सादर प्रणाम 


(अस्तित्व में न जीत है न हार है...सब साथ साथ हैं, harmony में हैं, बस एक मानव अवस्था को छोड़कर... जिस क्षण से मानवीयता की जीत होगी उस पल से सही मायने में वास्तविक जीत शुरू होगी)

Thursday, May 16, 2019

खुश होने के लिए या खुश होकर काम करें?

वर्तमान में बच्चों में पढ़ाई के दबाव से आत्महत्या की प्रवृत्ति चिंता का विषय है।
जीवन में कई बार उतार चढ़ाव आते रहते हैं और आत्महत्या से यदि को कोई समाधान निकलता तो हर कोई करता।
दिन भर विचार इसी पर चल रहा था कि एक बच्चा दबाव में आत्महत्या कर लेता वही एक दूसरा बच्चा या व्यक्ति कितना भी दबाव हो उसे वह दबाव ही नहीं लगता। क्यों?
क्योंकि वह हर काम खुश होकर करता है और खुशी में हजारों काम बगैर पलक झपकाए उत्साह के साथ कर सकते हैं।
यहाँ जिन बच्चों ने आत्महत्या के कदम उठाए उनको सुनने पर यह ज्ञात हुआ कि वे जो भी कर रहे थे माता- पिता के दबाव से कर रहे थे। वे उसे अपनी खुशी से नहीं कर रहे थे।
https://www.facebook.com/bhupendrakhidia/videos/680309032405055/
ऐसा नहीं है कि माता-पिता को अपने बच्चों से प्रेम नहीं वे उनका भला नहीं चाहते हैं पर कहीं तो कुछ गैप है उसे समझने की आवश्यकता है।
समाधान ये हो सकता है कि या तो आप जो उसके भले के लिए सोचते हैं उसे संवाद के माध्यम से उसके सामने रखने का प्रयास करें। उसे हर आयाम से बताया जाए कि उसके लिए मेरा (माता-पिता) यह सोचना क्यों सही है? कैसे सही है? उसे अनेक उदाहरण दिये जाए।
फिर यदि वह आपकी बात से स्वीकृत होकर उसे स्वीकारता है तब ठीक है फिर उसे बराबर मार्गदर्शन देते रहिए। पर हर समय इस बात का ध्यान रखा जाये कि उस पर किसी भी प्रकार का दबाव नहीं बने। दबाव मतलब शासन और शासन किसी को स्वीकार नहीं।
हाँ अगर आपके (माता-पिता) ऊपर यदि आपके बच्चे की 100% स्वीकृति है तो वह आपके हर बात को सहर्ष स्वीकार कर लेगा क्योंकि उसे पता है कि आप जो भी कदम उठा रहे हैं उसके भले के लिए है।
दूसरा समाधान ये हो सकता है कि बच्चा जिस भी विषय में interest रखता हो उस पर आप खोज करिए कि कैसे वह विषय उसके व्यक्तित्व के विकास में उसे मदद कर सकता है। और उसके सामने वह विषय कैसे उसके लिए उपयोगी हो सकता है इसका पूरा structure सामने रख दे। यह उसके लिए बेहद मदद गार होगा।
बच्चों को हम ऐसे यूं ही नहीं छोड़ सकते कि उसे जो पसंद वही करे और हम चुप चाप शांति से बैठ जायें! ...बेशक वह वही करे पर हमें अच्छे से खोजबीन करना होगा कि उसकी पसंद को और कैसे बेहतर बनाया जा सकता है ताकि वह उसकी जिंदगी जीने में काम आए।
यदि आप confuse हो तो counselling भी कर सकते हैं।
किसी अच्छे counselor का पता कर उनसे संपर्क किया जा सकता है।इससे आपको बहुत मदद मिलेगी....

मुख्य बात यह है कि हमारी संतान कोई भी काम खुश होकर करें। हमारी संतान ही नहीं हमें भी इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता है।
आवश्यकता है कि नहीं जाँच लीजिये :)







चित्र साभार:https://www.ndtv.com/delhi-news/india-which-has-long-focused-on-student-success-now-offers-happiness-classes-1887803?fbclid=IwAR18KNZ4AJ_hjUx1GXGrTuYpUpjMwwVhcIuao779fHX2f9scCQtT9OLTV_8
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आपके सुझावों का स्वागत है।

Saturday, March 9, 2019

मानवीयता मध्यस्थ का ही एक रूप

आज के माहौल को देख कर विचार उठ रहा था कि हमें आवेश तो दिखाई देता है पर शांति, अमन चाहने वाले क्यों नहीं दिखाई देते? अखबारों या टीवी चैनल में देखिये सबसे पहले नकारात्मक या आवेशित खबरें ही दिखाई देती हैं? शांति वाली खबरें हम खुद ही नहीं देखते!
फिर याद आया श्रद्धेय बाबा श्री ए. नागराज जी की बातें जो मैंने रिकॉर्डिंग में सुना था कि वर्तमान शिक्षा में आवेश पैदा करके या चीजों को चीर-फाड़ कर तोड़ -फोड़ कर, परमाणु को आवेशित कर ही अध्ययन किया जाता है। मध्यस्थ वस्तु व मध्यस्थ क्रिया कुछ होता है अभी तक ज्ञात नहीं था। 
इसलिए हमारा जो अब तक का पूराना अभ्यास रहा है इसी वजह से हम आवेश को ही पहचानते हैं मध्यस्थ को नहीं जबकि मध्यस्थ वस्तु व मध्यस्थ क्रिया के कारण ही यह सारा अस्तित्व और सौंदर्य दिखाई पड़ता है।
इस अभ्यासानुसार हम चाहे इकाई - जड़ हो या चैतन्य पहले आवेशित करते हैं फिर उसके स्वभाव का अध्ययन करते है जैसा कि हम अभी देख ही रहे हैं!!! जबकि आवेश हमारा स्वभाव गति है ही नहीं! 
और जिस वस्तु व क्रिया के कारण वह इकाइयाँ व व्यवस्था बनी रहती है और जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है उस पर ध्यान नही दिया जाता।
मध्यस्थ क्रिया या मध्यस्थ वस्तु का ही अध्ययन सबसे महत्वपूर्ण है। कैसे कोई इकाई अपने में बने रहती है। कैसे कोई परंपरा (पदार्थ, प्राण, जीव व ज्ञान) बने हुए हैं या कैसे बने रहेंगे? इसका ही अध्ययन होने की आवश्यकता है।
मध्यस्थ दर्शन से हमने पाया कि मध्यस्थ स्थिति (जागृति) को प्राप्त करना ही लक्ष्य है। सारे आवेश मध्यस्थ स्थिति में आने पर ही नियंत्रित होते है।
सम और विषम गुण बाकी तीन अवस्था (पदार्थ, प्राण और जीव) के लिए महत्वपूर्ण है उपयोगी व पूरकता को प्रमाणित करता है पर भ्रमित मानव में विषम गुण (युद्ध, क्रोध, ईर्ष्या, शिकायत, अहंकार आदि) जो आवेश रूप में व्यक्त होता है कभी भी उपयोगिता और पूरकता (संतुलन) को व्यवस्था में प्रमाणित नहीं कर पाता। इसलिए खुद भी पीड़ित, दुखी रहता है और दूसरों को भी प्रभावित करता रहता है। 
जबकि अनुभव-संपन्न मानव का कार्य-कलाप भी सम-विषम ही होता है, पर वह मध्यस्थ क्रिया (आत्मा) द्वारा नियंत्रित होता है।
अत: मानवीयता मध्यस्थ गुण का ही एक रूप है इसलिए इतिहास मानवीयता का ही होगा व अध्ययन भी इसी का होने की आवश्यकता है। इसके अध्ययन से ही हमारी आने वाली पीढ़ी अपना पूरा ध्यान, कैसे इस मध्यस्थ स्थिति को प्राप्त किया जाए इस पर लगाएगी। व पूर्णता (जागृति) को प्राप्त करेगी।
कल्पना कीजिये कितना सुंदर समय होगा वह! :)

(मध्यस्थ दर्शन से प्रेरित विचार)
मध्यस्थ दर्शन के विद्यार्थी के हैसियत से

Monday, March 4, 2019

एक आवेशित व्यक्ति का प्रभाव

हमारी एक सहयोगी ने दुखी हो बताया कि उनका 4 वर्षीय नाती टी वी देख देखकर कहने लगा हैं -"चलो हम लोग भी बंदूक चलाएँगे।"
और साथ ही कह रही थी कि कई मुस्लिम समुदाय के लोगों ने स्वयं को भय से घर में बंद कर लिया है और कह रहे थे हम सब यह घर छोड़ कर चले जाएँगे।
देखिये एक नासमझ व्यक्ति ने 44 सैनिकों पर हमला किया। परिणामस्वरूप सारे देश में आक्रोश की लहर फैल गई।
क्या उसने एक मिनिट जरा सा भी यह सोचा कि उसके एक इस गलत कार्य से कितने मुस्लिम समुदाय के भाई-बहन भय में आ जाएंगे?
उस एक गलती का परिणाम... आज दोनों देशों में युद्ध की स्थिति आ गई!!!!
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एक जागृत मानव, भ्रमित मानव के सारे आवेश को अपने में समा लेता है जैसे यह धरती सूर्य के आवेश को अपने में समा लेती है...पर भ्रमित मानव भ्रमित मानव के आवेश को हजम नहीं कर पाता और वह और दोगुने आवेश के रूप में व्यक्त होता है... और इसका परिणाम कभी भी अच्छा नहीं होता।
हमें बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है...उदाहरण हमारे सामने ही है।
सीरिया के आवेश को कुचलने के लिए रूस ने जो तरीका अपनाया पूरा सीरिया बर्बाद होगया। एक एक दिन में कई कई बच्चों की लाशें कफन में लपेटे दिखाई देती थी।
अफगानिस्तान जिसे अमेरिका ने हथियार देकर रूस के खिलाफ तैयार किया (सूचनानुसार) जब वे अमेरिका के लिए खतरा हो गया तो उसे दबाने की भरसक कोशिश की गई। (जो दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है स्वयं उसमें गिर जाता है)
इतनी लंबी लड़ाई लड़ने के बाद और जंग में अपने सैनिकों के बेवजह मृत्यु से परेशान अमेरिका ने अंत में अपने सैनिकों को वापस बुलाया और कहा इसमें सभी देश इसमें सहयोग करें व अपने सैनिकों को भेजें। (सूचनानुसार)
जहाँ तक मैंने समझा कि अधिकतर जंग धर्म/ आस्था/ जेहाद के नाम पर लड़े जा रहे हैं। और कहीं धन (प्रतीक) के लालच में याने हमने जिसे "माना हुआ" या जो हमारी "मान्यता" है उसके लिए हम अपना सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हैं। हथियारों का व्यापार कैसे बढ़े इसका भी प्रयास दिखता है।
इसमें इनकी कोई गलती नहीं है -जिसने जिसको महत्वपूर्ण माना हुआ है उसने इसके लिए अपना सब कुछ लगा दिया।
और जब सही का प्रस्ताव उनके सामने आएगा तो वे सही के लिए अपना तन मन धन लगाएंगे।
ऐसे वातावरण तैयार करने की ज़िम्मेदारी उनकी सबसे पहली है जिसे सर्वप्रथम सही की सूचना प्राप्त हो गई है। अपनी (जीवन की) ताकत को पहचाने और उसे सही समझकर सही के लिए लगा दिया जाए (एक प्रस्ताव)।
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एक बार समझदारी का वातावरण (स्वयं को सुरक्षित रखते हुए) तैयार हो जाए फिर सारे आवेश, पीड़ा, दुख, भय, आतंक, क्रोध उसमें विलय हो जाएंगे।
एक महत्वपूर्ण बात कैसी भी विपरीत परिस्थिति सामने आए "आशा" न छोड़ें। 

Friday, January 18, 2019

आखिर क्यों?


आए दिन अखबार में ऐसी खबरें लगभग रोज आ रही हैं।
छत्तीसगढ़ में जंगली जानवर विशेषकर हथियों की आक्रामकता दिनों दिन बढ़ती जा रही है। इसका सीधा सा अर्थ है कि हमसे मानव जाति से गलतियाँ हो रही है जिससे यह रूप देखने को मिल रहा है। 
आखिर ऐसा क्या हो रहा है जिससे मानव और जंगली पशु में आए दिन संघर्ष का माहौल बनते जा रहा है?
ऐसा सरकारें क्या कर रही है कि संघर्ष का वातावरण बनते जा रहा है?
सरकारों में ऐसे निर्णय क्यों लिए जाते हैं कि ऐसी स्थिति बनती जा रही है?
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क्या जनता द्वारा चुने हुए लोगों ने शिक्षा ग्रहण नहीं किया था?
क्या ये चुने हुए प्रतिनिधि साक्षर और समझदार नहीं है?
क्या इन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा में यह नहीं पढ़ा कि :-
पर्यावरण संतुलन कैसे रखा जाए? 
पर्यावरण संतुलन का क्या अर्थ होता है? 
पर्यावरण या प्रकृतिक संतुलन क्या है? 
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क्या हममें से जो भी ऐसे प्रकृति विरोधी काम कर रहे हैं। जैसे प्राकृतिक जंगल को उद्योग के लिए काटना...क्या इन्होंने कभी पर्यावरण शिक्षा ग्रहण नहीं की?
अगर ऐसी शिक्षा ग्रहण की तो यह क्यों इन लोगों की मानसिकता में नहीं आई?
क्यों इनके जीने में नहीं आई या आ रही है?
आखिर इस वर्तमान शिक्षा में क्या कमी है कि मानव जाति को अपनी गलती दिखाई नहीं दे रही? अगर दिखाई दे भी रही तो वह स्वीकार क्यों नहीं कर रहा है? क्यों सुधार नहीं कर पा रहा है? क्यों वह प्रकृति और मानव जाति का शोषण कर रहा है? क्यों वर्तमान शिक्षा सही प्रकार से जीने में नहीं आ रही है?

कृपया इस पर गंभीरता से विचार करें....

Thursday, October 18, 2018

मानवीय स्वावलंबन

स्वयं स्फूर्त विधि से उत्पादन करने वाली परंपरा को "स्वावलम्बन" कहते है। उत्पादन कार्य में कुशलता,निपुणता व समझदारी सहित परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन करने वाले व्यक्ति को" स्वावलंबी कहा "जाता है।
श्रमशील व्यक्ति ही स्वावलंबी हो सकता है।जो व्यक्ति श्रम करने के लिए तैयार है वो कभी बेरोजगार नहीं हो सकता है। समाज में बेरोजगारी आज विकराल समस्या बनते जा रही है क्योंकि अधिकांश युवक शिक्षा पूरी करने के बाद नौकरी ही करना चाहता है। आज हर व्यक्ति पैसे को "प्रधान साधन" मान लिए हैं जबकि इस बात को हमें समझने की आवश्यकता है की श्रमशीलता हमारा प्रधान साधन है। पैसा सबके पास हमेशा रहे ऐसा जरूरी नहीं है। लेकिन श्रमशीलता सबके पास है ही। एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो श्रमशीलता से रिक्त हो। गूंगे,लूले,लंगड़े सभी के पास श्रमशीलता रहता ही है। अतः कोई भी व्यक्ति श्रम की मानसिकता बना ले और सही समझ के अनुसार श्रम करें तो स्वावलंबी हो ही जाएगा । आज स्वावलंबन के अनेक अवसर मौजूद हैं। मेरे गुरूजी कहा करते है जितने आपके सिर में बाल हैं उतने उत्पादन कार्य हैं। आवश्यकता है तो सिर्फ स्वालंबन को समझने की। स्वावलंबन को समझने के लिए हर व्यक्ति को स्वावलंबन का लक्ष्य और प्रयोजन स्पष्ट होना होगा। 
स्वावलंबन का लक्ष्य है परिवार में समृद्धि का भाव अर्थात परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन। स्वावलंबन के लिए व्यवसाय (उत्पादन कार्य) चुनते समय इस बात का ध्यान रखने की आवश्यकता है।
है कि मेरे द्वारा किये जा रहे व्यवसाय से प्रकृति का संरक्षण,संवर्धन और सदुपयोग हो रहा है की नहीं। इस बात को अच्छे से समझने की आवश्यकता है कि मेरे द्वारा किये जा रहे व्यवसाय से प्रकृति संरक्षित और संवर्धित हो । जैसे कि मैंने कृषि-गौशाला व्यवसाय को मेरे स्वावलम्बन के लिए चुना है जिसमे मै प्राकृतिक खेती करता हूँ । जिसमे सिर्फ गोबर गोमूत्र का उपयोग खाद और कीटनाशक के रूप करता हूँ । जिससे हमारे परिवार को पौष्टीक आहार तो मिलता ही है साथ में जमीन का उपजाऊपन बढ़ता ही जा रहा है अर्थात जमीन और अधिक उपयोगी होते जा रहा है।जिससे आने वाली पीढ़ी को अधिक उपजाऊ जमीन मिलेगी। इसी तरह से अगली पीढ़ी भी उत्साहित हो कर ऐसा ही करती रहेगी जिसकी परंपरा बनेगी। जिससे आने वाली पीढ़ी इस व्यवसाय में स्वावलंबी रहेगी ही। आजकल के अधिकांश किसान लाभ के चक्कर में अधिक उत्पादन के लिए रासायनिक खाद व कीटनाशकों का उपयोग कर रहें हैं जिससे मानव तो बीमार हो ही रहा है । धरती भी बीमार हो रही है। धरती बंजर होती जा रही है। ऐसे में आने वाली पीढ़ी कृषि कार्य कैसे कर पाएगी। इतना ही नहीं मानव अभी हर व्यवसाय में सिर्फ अपना ही लाभ देख रहा है। जिस कारण से मौसम का असंतुलन बढ़ते ही जा रहा है। प्रदूषण बढ़ते ही जा रहा है और धरती तापग्रस्त होते ही जा रहा है।
आजकल के अधिकांश किसान अधिक लाभ के लिए नासमझीवश सिर्फ रासायनिक खाद व कीटनाशकों का उपयोग कर रहें है या कुछ जो अपने को नासमझीवश समझदार मानने लगे है वो अपने परिवार के लिए अपने कुछ जमीन में आर्गेनिक खेती कर लेते हैं और खुश होते रहते है की हम आर्गेनिक अनाज खा रहें है । अब यहाँ नासमझी क्या होती जैसे कि मान लो कि किसी किसान के पास 10 एकड़ जमीन है उसमे से 9 एकड़ में रासायनिक खाद से अनाज लगाया और अनाज को बाजार में बेचकर अधिक पैसा कमाकर खुश हो जाता है। और शेष 1 एकड़ में अपने परिवार के लिए आर्गेनिक अनाज लगा कर खुश हो जाता है कि परिवार और समाज दोनों के साथ निर्वहन हो गया। अब चूँकि पैसा अधिक कमाया है तो स्वाभिक है कि बच्चे की अच्छी पढाई में भी खर्च होगा ही याने की उनका बच्चा पढ़ने के लिए शहर जाएगा और होस्टल की फीस देगा । फिर होस्टल वाले केन्टीन के लिए बाजार से आनाज खरीद लायेंगे। स्वाभाविक है ये वही 9 एकड़ रासायनिक खाद वाला ही अनाज होगा जिसको सामाज के लिए बाजार में बेच आये थे। सोचने की बात ये है कि उस किसान ने अपने बच्चे को रासायनिक खाना खाने से बचा पाया क्या?
चलो मान लो कि उन्होंने जो 1एकड़ का आर्गेनिक अनाज जो की अपने परिवार के लिए लगाया था को किसी भी तरह से भेजकर खिलाकर अपने बच्चे का पोषण कर भी लिया। अब उनका बच्चा बड़ा हो गया। उनकी शादी करनी है। तो वह किसान अपने बच्चे के लिए दुल्हन कहाँ से लाएगा??? वही 9 एकड़ की रासायनिक अनाज खाने वाली ना!! कहाँ बचा पाए अपने आने वाली पीढ़ी को रासायनिक आहार से?? सोचने का मुद्दा है??
स्वावलंबन में उत्पादन का "प्रयोजन" है कि "परिवार के हर सदस्य के शरीर का पोषण-संरक्षण स्वस्थता के अर्थ में और समाज में भागीदारी के लिए आवश्यकता के अर्थ में है। "इस तरह से हम समाज में भी सार्थक भागीदारी करते हैं। जिससे स्वयं में तृप्ति होती है। समाज में परिवार का पहचान होता है जिससे परिवार की तृप्ति होती है। एस तरह से समृद्ध परिवार परंपरा बनती है।
मानव की भौतिक आवश्यकताओं को अगर देखा जाय तो सीमित है जिसका वर्गीकरण भी निश्चित है जैसे मानव की मूल आवश्यकता आहार,आवास और अलंकार है जो कि शरीर को स्वस्थ रखने के लिए तथा दूरगमन, दूरदर्शन तथा दूरश्रवण जो की शरीर के बेहतर सदुपयोग के लिए आवश्यक है।
इन आवश्यकताओं की पूर्ती आसानी से हो सकती है अगर तन,मन और धन का उपयोग उत्पादन के लिए सही को समझकर करें। सही प्रशिक्षण लेकर विज्ञान और तकनीकी का सही उपयोग करें। अभी सामान्यतः लोग सोचते है करने से समझ में आयेगा। जबकि समझ के अगर करें तो फल परिणाम भी निश्चित ही होता है।
स्वावलंबन के लिए सम्बन्धों को पहचानना जरूरी है। मानव-मानव के साथ और मानव-प्रकृति के साथ। सिर्फ सुविधा-संग्रह के लिए उत्पादन करने से मानव सुखी नहीं हो सकता । परिवार की आवश्यकतायें स्पष्ट एवं सुनिश्चित होने से उत्पादन कार्य में स्वावलंबी हुआ जा सकता है।

बगैर उपकार भाव के प्राकृतिक खेती संभव ही नहीं

"मानव जाति सही में एक" और "मानव संबंध है मैं का मैं से, इसे बनाने की आवश्यकता नहीं, केवल परिवार में ही नहीं... हर मानव के साथ है।" "सभी मानव मेरे संबंधी है" जब तक यह भाव, दृष्टिकोण मानसिकता में नहीं तब तक उपकार भाव सहित प्राकृतिक खेती संभव नहीं!

खैर....
घर में चावल खत्म हो चुके थे। मैंने बसंत भैया (ग्राम- हिंग्नाडीह) से प्राकृतिक तरीके से उत्पादित चावल की डिमांड की। कुछ दिन बाद मीना भाभी जी द्वारा उत्पादित चावल हमारे यहाँ पहुँचा। 
कुछ समय पश्चात मंजीत भैया जी द्वारा निर्मित देशी गाय का घी, मीना भाभी जी द्वारा तैयार मूंगफल्ली,गुड़ और तिल के पापड़ी,पूनम बहन जी द्वारा तैयार भूनी हुई अलसी और गोपाल भैया जी का दंतमंजन, प्रेमलता बहन जी का खाकरा (लहसून फ्लेवर), योगेश भैया जी द्वारा तैयार न्यूट्रिगेन, अवधेश भैया जी (बेमेतरा), बसंत भैया और बघेल भैया जी के पास से चावल, बालमुकुंद और विधि बहन जी तैयार कूकीज़ भी हमने लिए। 
चावल की कीमत मात्र 50 रुपये, 60 रुपये, और 70 रुपये किलो था। 
पहले शायद यह कीमत भी ज्यादा लग सकती थी पर अब श्रम पूर्वक प्राकृतिक विधि से उत्पादन में लगे भाई -बहनों को देखकर यह कीमत तो कुछ भी नहीं लगी।
दो प्रकार के दृश्य आँखों के सामने तैर गए...पहला वे लोग जो ए. सी. कमरे में लैपटाप पर कुछ समय बिताकर लाखों रुपये कमा लेते हैं... वहीं कुछ लोग घंटों पसीने बहाकर उत्पादन कर पाते हैं...परिणाम कभी हाथ में आता है तो कभी प्रकृति के कोप का शिकार हो जाता है।
और जो हाथ में आता है बाजार में उसकी कीमत न के बराबर होती है। जितनी कमाई होती है अक्सर उससे ज्यादा खेती में ही लग जाती है। इसलिए कई लोग प्राकृतिक तरीके को छोड़ कर रासायनिक खेती में चले जाते हैं पर इससे तो उनकी खेती और खेत दोनों को ही नुकसान पहुँच रहा है, यह बात उन्हें बहुत देर से समझ में आता है।
खैर इन सब स्थिति के बाद भी कुछ भाई बहन जो प्राकृतिक विधि से उत्पादन में लगे हुए हैं वे अपने कार्यों को खुशी- खुशी कर रहे हैं क्यों? 
आप इनसे मिलकर जरूर पूछियेगा। 
इनमें से कई भाई बहन मानवीय स्वावलंबन हेतु या तो प्राकृतिक खेती (आवर्तनशील खेती) पूर्वक उत्पादन में लगे हुए हैं या फिर ऐसे उत्पादों से विभिन्न प्रकार के पकवान तैयार कर रहे हैं। यह सब उनके शोध का ही हिस्सा है जिसे वे जीकर देखना चाहते हैं। उसके फल- परिणाम को देखना चाहते हैं। 
और ऐसे ही भाई -बहन अभ्युदय संस्थान (प्रबोधक के रूप में), अभिभावक विद्यालय रायपुर, व अभ्युदय संस्थान स्थित हाल में खुले नए विद्यालय में शिक्षक -शिक्षिका के रूप में अपनी भागीदारी कर रहे हैं...महाराष्ट्र, गुजरात, यू.पी., मध्यप्रदेश और बाकी राज्यों में भी कई भाई बहन इस प्रकार के प्रयास में लगे हुए हैं। आप सभी शिक्षा उपकार विधि से दे रहे हैं... बदले में ये कोई वेतन नहीं लेते, बल्कि स्वावलंबन विधि से जो कमाई होती है उसका कुछ अंश वे विद्यालय में ही लगाते हैं।
बाकी और शिक्षक फिलहाल अभी इस प्रकार उत्पादन नहीं कर रहे हैं पर वे भी मानसिक रूप से पूरी तरह तैयार हैं...अवसर मिलते ही वे भी स्वयं को प्रमाणित करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। 
ऐसे सभी भाई -बहनों के प्रति कृतज्ञता का भाव अर्पित करती हूँ...
अभिभावक विद्यालय व अभ्युदय संस्थान (अछोटी) द्वारा संचालित विद्यालय के शिक्षिकाएँ जो वर्तमान में उपकार भाव से अपनी सेवायें प्रदान कर रही  हैं साथ ही कई बहनें प्राकृतिक विधि से उत्पादन में भी भागीदारी कर रही हैं।


आप सभी से एक निवेदन है कि आप जिस जगह में निवास करते हैं ऐसे उपकार विधि से प्राकृतिक खेती कर उत्पादन करने वाले लोगों की पहचान कर उन्हें बढ़ावा दीजिये। उन्हें प्रोत्साहित करिए। 
मैं कभी भी ऐसे अमृत रूपी उत्पादन के साथ मोल भाव नहीं करती...इससे ज्यादा हम कपड़ों लत्तों में या फिर इलेक्ट्रोनिक समान में या फिर मौज मस्ती में खर्च कर देते हैं। हालाँकि "आवश्यकता" समझ में आने पर यह भी नियंत्रित हो जाता है।
जबकि ऐसे अमृत रूपी उत्पाद हमें और हमारे परिवार को स्वस्थ्य रखने में बहुत बड़ी भूमिका निभाते हैं। स्वस्थ्य समाज के लिए व धरती की व्यवस्था बनाए रखने हेतु हमें ऐसे लोगों की अत्यंत आवश्यकता है।
याद रखिए कि आप सभी उपकार विधि से चलने को वचनबद्ध हैं, प्रयासरत है अत: हम इनके उत्पाद के बदले जो भी श्रम मूल्य देंगे वह सब उपकार (शिक्षा) में ही लग रहे हैं या लगेंगे। इस तरह से हम स्वयं की ही मदद कर रहे हैं।

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कुछ ऐसे स्थान मुझे ज्ञात है या सूचना है जहाँ भाई-बहनों ने जो या तो प्राकृतिक खेती में लगे हुए हैं या शिक्षा के साथ प्राकृतिक खेती में लगे हुए हैं (उत्पादन और शिक्षा आयाम में भागीदारी) उन्होंने अपना सामान विनिमय या क्रय -विक्रय हेतु रखा हुआ है। आप भी चाहें तो उनसे संपर्क कर सकते हैं-
मध्यस्थ दर्शन के शोधरत विद्यार्थियों द्वारा प्राकृतिक तरीके से तैयार किए गए उत्पाद।


इन स्थानों से आप देशी गीर गाय के दूध (A 2) से बने उत्पाद, लस्सी, छाछ, पेड़ा, घी इत्यादि एवं प्राकृतिक तरीके से उत्पादित उत्पाद (Natural Farming product) अनाज, दाल, चावल, गुड़, खाखरा, फल्ली, आचार, मुरब्बा इत्यादि किराना सामान यहाँ से प्री ऑर्डर पर प्राप्त कर सकते हैं।

1. स्वायत्त कृषि गौशाला, अभ्युदय केंद्र, ग्राम -हिंगनाडीह,अहिवारा, जिला-दुर्ग (छ.ग.), मो.नं. -09893501677

2. समृद्धि, नगर निगम कॉलोनी, कृष्णा टाकीज़ रोड, समता कॉलोनी, रायपुर (छ. ग.), मो. नं.- 09009846956 

3. स्वीकृति, फाफाडीह रोड, रायपुर, छ.ग. 492001, मो. नं.- 096913 59929

4. Go Organic, दीनदयाल गार्डन के पास, व्यापार विहार ज़ोन न. 1, बिलासपुर छ.ग., मो. नं.- 09009846956

5. हितार्थ स्वावलंबन केंद्र, समृद्धि विहार, बेमेतरा, छ.ग., मो. नं.- 08959974845

6. Prakriti Organics jareli, Bilaspur, Mo. No.-07748082636

7. श्री राम डेयरी एंड ऑर्गेनिक्स, शॉप नं. तिरंगा भवन, पद्मनाभपुर, दुर्ग (छ.ग.), मो. नं.- 09770187320

8. Swikritii, New Shanti Nagar Raipur 492001, Mo.No.- 090098 59091, https://www.facebook.com/swikritiraipur/

9. Shree Ram Krushna Trust, Kukma, Ta. Bhuj-Kachchh (Gujarat), mo. no. +91 94265 82810 ramkrushnatrust@gmail.com, http://shreeramkrushnatrust.org/about/

इनके अलावा आपको और ऐसे जगह पता हो तो कृपया कमेन्ट बॉक्स पर लिखिए ताकि हम सभी को इसकी जानकारी हो।
धन्यवाद 
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"समग्र व्यवस्था में भागीदारी करने का तात्पर्य - मानवीय शिक्षा कार्य में, न्याय सुरक्षा कार्य में, परिवार की आवश्यकता से अधिक उत्पादन कार्य में, लाभ-हानि मुक्त विनिमय कार्य में, स्वास्थ्य-संयम कार्य में भागीदारी करने से है।" श्रद्धेय श्री ए. नागराज जी